Friday, 24 February 2023

महाशिवरात्रि सनातन संस्कृति का महापर्व आदि शिव का प्रकटोत्सव दिवस है

शिव आदि है अनंत है अविनाशी है निराकार है महायोगी है देवाधीदेव है महादेव है प्रकृति है अगोचर है
हम सबने सुना है ईश्वर एक है वो "शिव" ही है।
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कण कण में है शिव, शिव अनंत ऊर्जा है शिव के बिना ब्रह्माण्ड की संकल्पना ही नहीं की जा सकती है सूर्य चंद्र पृथ्वी जल आकाश नभ नव ग्रह सप्तर्षि, सप्त नदिया और ब्रह्माण्ड की समस्त दिव्य शक्तियां व ऊर्जा "शिव" के अंश मात्र है 

शिव अनंत ऊर्जा है शिव ही "शंकर" शिव ही "विष्णु" शिव ही "ब्रह्मा" है 
शिव ही रचनाकार पालनहार और संहारक है 
शिव "आदिपुरुष" और प्रकृति "आदिशक्ति" के संयोजन से निराकार शिव, शहस्त्राब्दी वर्ष पूर्व त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश की इच्छा व प्रेम से वशीभूत होकर आदिशिव महादेव ने फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष के चतुर्दशी तिथि की रात्रि, प्रदोष काल में मानव कल्याण के लिए अपने भक्तों में योग उपासना व भक्ति भाव जागृत करने के लिए "लिंग" आकार लिया ...............
वैसे तो सनातन संस्कृति में विक्रम संवत् के अनुसार प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है जो की अमावस्या तिथि के एक दिन पूर्व आता है चूंकि फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि को मानव कल्याण हेतु स्वयं भू लिंग आकार में महादेव शिव ने त्रिदेव भक्तों को दर्शन दिया और इस ब्रह्माण्ड में सर्वप्रथम श्री हरि विष्णु और ब्रह्मा जी ने ही शिवलिंग आकार महादेव का दिव्य दर्शन और पूजन किया इसी लिए फाल्गुन मास की शिवरात्रि "महा शिवरात्रि" कहलाती है। महाशिवरात्रि आदि शिव के प्रकटोत्सव का दिवस है आदि शिव व आदि शक्ति के प्राकृतिक संयोजन का दिन है। मान्यता है महाशिवरात्रि पर सभी देवतागण और दिव्य आत्माएं पृथ्वी पर स्वयं भू शिव लिंग का साक्षात दर्शन करने सूक्ष्म रुप में आते है इसीलिए महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण व मंत्र जाप का भी बहुत है।

शिवलिंग हमे यह संदेश भी देता है कि आदिशिव व आदिशक्ति एक ही है अलग अलग नहीं और यही महादेव और प्रकृति स्वरूपा आदिशक्ति के अर्धनारीश्वर रूप  का आधार भी है..............

महाशिवरात्रि महापर्व को लोग शंकर भगवान और पार्वती माता के विवाह वर्षगांठ के रूप भी में मनाते है इसमें कोई बुराई नही लोग अपने आराध्य देव महादेव और जगत जननी की भक्ति महाशिवरात्रि पर विवाह वर्षगांठ मनाकर करते है अच्छी बात है लेकिन "शिव  महापुराण" के  सती खण्ड के अनुसार सच्चाई यह है कि भगवान शंकर - माता सती का विवाह चैत्र मास की त्रयोदशी तिथि को हुआ था और पार्वती खण्ड के अनुसार माता पार्वती और शंकर का विवाह मार्गशीर्ष चतुर्दाशी को हुआ था। इस लिए महाशिवरात्रि को यदि हम योगसाधना ध्यान व मंत्र सिद्धि अथवा आत्म साक्षात्कार के माध्यम से ह्रदय में उपस्थित शिव के दिव्य अंश दिव्य आत्मा को जागृत करने और अध्यात्मिक चेतना के विकाश के लिए करे तो और अच्छा होगा.....

तीन पत्तो वाले बेलपत्र महादेव को प्रिय है क्यो कि बेल पत्र के तीन पत्तो वाली टहनियां ब्राह्म विष्णु महेश के प्रतीक रूप है जो मानव कल्याण के लिए प्रकृति की अमूल्य निधि है वैसे भी शिव पुराण में बेल वृक्ष को साक्षात शिव का व पीपल के वृक्ष में श्री हरि विष्णु का वास बताया गया है इसी लिए तीन पत्तो वाले बेलपत्र को शिवलिंग पर चढ़ाने से शिव की कृपा प्राप्त होती है

महादेव यानि शिव जो निराकार है सर्वश्रेष्ठ है उनका एक ही आकार है वो है शिवलिंग और शिव के शरीर धारी रूप है ब्राह्म विष्णु महेश व सप्तऋषि है, महेश ही शंकर है शंकर योगी है संन्यासी है संत है साधु है त्यागी है दानी है अघोरी है विनाशक है मृत्युदाता और जीवन रक्षक भी है और यमराज इनके सेनापति, भूत प्रेत पिशाच डांकिनी शाकिनी निशाचर सब इनके सहयोगी है।

बेलपत्र के अलावा महादेव को जल धारा बहुत प्रिय हैं क्यों कि जल से महादेव को शीतलता प्राप्त होती है ऐसा इस लिए की जब समुद्र मंथन से निकले विष को महादेव ने मानव कल्याण हेतु ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए स्वयं ग्रहण कर लिया था तब शिवशंकर का शरीर नीला पड़ गया और हिमालय के नीलकंठ पर्वत पर विश्राम करने गए तब श्री ब्रह्मा विष्णु के साथ सभी देवतागण उनका जलाभिषेक किया जिससे उनके शरीर को शीतलता प्राप्त हुई और महादेव को  नीलकंठ के नाम से पुकार गया। आज भी नीलकंठ महादेव का शिवलिंग ऋषिकेश के पास नीलकंठ पर्वत पर स्थित है जहां जलाभिषेक का बहुत महत्त्व है। महादेव के अभिषेक करने कई अन्य विधियां भी है जैसे दूध से अभिषेक लेकिन ऐसा विशेष उद्देश्य या कार्य के संकल्प के लिए प्रयोग करना चाहिए ना कि जब भी मंदिर जाए एक लीटर दूध ही चढ़ाके आ जाए।

हर हर महादेव ॐ नमः शिवाय

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Saturday, 11 February 2023

पुरानी पेंशन बहाली की मांग देशहित में तर्कसंगत है या केवल सत्ता वापसी की राजनीति?

हिमाचल प्रदेश में पुरानी पेंशन बहाली के सहारे कांग्रेस पार्टी को सत्ता में वापसी के बाद से देश के अन्य हिस्सों में ये मुद्दा और गरम हो रहा है। कांग्रेस पार्टी की २०२३ में होने दस राज्यों विधान सभा चुनाओं में सफलता की उम्मीदें और बढ़ गई है यदि परिणाम कुछ सकारात्मक रहा तो २०२४ के आम चुनाव में भी इसको हवा दिया जाएगा। मजेदार बाद यह है कि इस मुद्दे को सबसे पहले अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने २०१७ के विधान सभा चुनाव के घोषणा पत्र में शामिल किया और २०१९ के लोकसभा चुनाव में भी इसको मुद्दा बनाया लेकिन कांग्रेस ने इसे छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अपनी पार्टी की सरकार द्वारा राज्य स्तर पर लागु करवाके हिमाचल प्रदेश में सत्ता वापसी कर लिया ........ 
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न तो ये हैं कि यदि पेंशन बहाली जनहित में इतना आवश्यक था तो २००४ से लेकर २०१४ तक में यूपीए सरकार के सत्ता में रहते हुए क्यों नहीं बहाल किया गया जबकि मनमोहन सिंह जी देश के बड़े अर्थशास्त्री के तौर पर प्रधामनंत्री की भुमिका निभा रहे थे और तब इसे बड़ी आसानी से किया जा सकता था क्यों कि पुरानी पैंशन योजना खत्म करने का कानून २००४ से ही लागू होना था ......
यदि मनमोहन सिंह जी ने उस समय पुरानी पैंशन योजना को बहाल नहीं किया इसका मतलब उनके दृष्टिकोणों से ये उचित नही रहा होगा और यदि तब कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार के सहयोगी दलों ने मनमोहन सरकार पर दबाव नहीं बनाया तो आज लगभग बीस साल बाद क्यो पुरानी पेंशन बहाली की मांग कर रहे है ......
इसका एक अर्थ तो यह निकलता है कि तब देश की आर्थिक स्थित इस लायक नही थी कि सरकार पेंशन का बोझ उठा पाए और मनमोहन जी को लगा होगा कि पेंशन के मद में जा रहे धन को देशहित जनहित के अन्य कार्यों में उपयोग किया जाएगा जिस उद्देश्य से अटल बिहारी जी की सरकार ने २००० में पेंशन योजना खत्म करने का कानून सदन में पास किया था जिसमे यह व्यवस्था किया गया था कि २००४ के बाद से नई भर्तियों में पेंशन व्यवस्था का रूप बदल जाएगा और वो पूर्णतः कर्मचारियों के ऊपर निर्भर करेगा।
एक दूसरा प्रश्न यह उठता है कि क्या २००० में जब पेंशन खत्म करने के कानून सदन में अटल बिहारी जी की सरकार द्वारा पास करवाया जा रहा था तो विपक्ष के नेता सदन में मौजूद नहीं थे या राहुल गांधी जी, सोनिया जी, अखिलेश यादव जी सांसद नही बने थे तब विरोध नही कर पाए और आज अचानक २०१९ आम चुनाव के बाद जागृत हो गए है कि कर्मचारियों के साथ अन्याय हुआ और फिर से पेंशन बहाली की जाए।

मुझे तो लगता है कि पेंशन बहाली और महंगाई का मुद्दा केवल सत्ता वापसी के लिए एक ढाल है और कुछ नही। अटल जी कि सरकार २००४ में महंगाई के मुद्दे पर ही चली गईं थी जब कि अटल जी राष्ट्रहित में देश के विकाश के लिए दृढ़ संकल्प के साथ काम कर रहे थे २००४-२०१४ तक महंगाई और बेरोजगारी का डाटा उठाके देख लिया जाए तो कुछ खास परिर्वतन नहीं कर पाई थीं यूपीए सरकार महंगाई और रोजगार सृजन के मामले में ......... ....
असलियत तो यह है कि भारत से महंगाई और बेरोजगारी की समस्या तब तक नही खत्म हो सकती जब तक कि जनसंख्या वृद्धि दर को संतुलित न किया जाए और कृषि उत्पादन को ना बढ़ाया जाए क्यों कि रोजगार सृजन की एक सीमित वार्षिक क्षमता है उससे अधिक सम्भव नही है लेकिन जनसंख्या वृद्धि की कोई निश्चित सीमा ही नहीं है । सीधी बात है कि मांग और उपलब्धता में संतुलन बनाए बगैर महंगाई बेरोजगारी की समस्या कभी नहीं खत्म हो सकती चाहे किसी भी पार्टी की सरकार आ जाए या कोई भी देश का प्रधानमन्त्री बन जाए

हास्यास्पद बात यह है कि देश में नेशनल पेंशन स्कीम एनपीएस की व्यवस्था करचारियो के लिए उपलब्ध है जिस कर्मचारी को जितना पेंशन चाहिए उतना प्लान कर ले तो ऐसे में पुरानी पेंशन बहाली की क्या जरूरत है लेकिन नही कर्मचारियों के नेता किसी न किसी पार्टी के समर्थक होते है उन्हे अपना नंबर पार्टी मुखिया के दिमाग में बढ़ाना और वरदहस्त प्राप्त करना है तो मांग तो उठाएंगे ही, हर साल महगई भत्ता में बढ़ोत्तरी के लिए, प्रत्येक साल वेतन वृद्धि भी के लिए, वेतन आयोग की अनुसंशा के अनुसार प्रत्येक पांच साल में एकमुश्त बड़ी वेतन वृद्धि के लिए, साल में १५० दिन से अधिक छुट्टियां, घर गाड़ी और बच्चों की शिक्षा के लिए ब्याज मुक्त ऋण भी , सालाना एलटीए और सुबह केवल दस बजे से ३ बजे तक ही काम चाहिए और जब आम आदमी के हित में जिमेदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम करने को कहा जाय तो उसमे में भ्रष्टाचार इतना व्याप्त है कि बिना कुछ जेब गरम हुए कदम व कलम आगे नहीं बढ़ेगा लेकिन सरकार ने एक पेंशन ख़त्म कर दिया तो उसके वापसी के लिए राजनीति हो रही है 
बेहतर होता कि देश के समस्त कर्मचारी राजनेताओं के पेंशन को देशहित में ख़त्म करने के लिए एकजुट होकर आवाज उठाते ना कि पुरानी पेंशन बहाली की मांग के लिए। 
वैसे ईमानदारी से पूछा जाए तो पेंशन का वास्तविक अधिकारी केवल देश के आम वृद्धजन, विधवा महिलाएं और अनाथ बच्चे है जिन्होंने कभी सरकारी नौकरी नहीं किया व जिसके पास मासिक आय का कोई श्रोत नही है। इस लिए देश के वृद्धजनों और विधववाओ का मासिक पेंशन बढ़ाके सीधे ६००० से अधिक कर देना चाहिए। 
यदि देश की राजनितिक पार्टियां वास्त्विक रूप से जनहित की देशहित की सोचते है तो पुरानी पेंशन बहाली की मांग के जगह जनसंख्या नियंत्रण, वृद्ध व महिला पेंशन वृद्धि की मांग करे जो जनहित देशहित में है  अन्यथा सत्तानीति और जातिवाद क्षेत्रवाद की राजनीति बंद करे। 
वैसे भी देशहित जनहित और विकाशहित में बात करना  ही केवल राजनिति कहलाती है अन्यथा सत्तानित और स्वार्थनीत के अलावा और कुछ नही। 

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Tuesday, 7 February 2023

संघ प्रमुख मोहन भागवत जी का संदेश क्या अब जातिवादी और क्षेत्रवादी राजनीति खत्म होनी चाहिए

संत रविदास जयंती के अवसर पर संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत जी महाराष्ट्र में रविदास जयंती कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रुप में शामिल हुए थे जहा उनके उद्बोधन के कुछ अंश को लेकर देश के राजनितिक गलियारे में बडी चर्चा का विषय बना है ...... 
राजनितिक गलियारा शब्द मैं इस लिए बोल रहा हूं क्यों कि आम जनता तो अपने रोजी रोटी और दैनिक जीवन के समस्याओं में इतना उलझी हुई है कि दिन भर मेहनत करके थका हारा शाम को आम आदमी जब घर लौटता है तो दो रोटी खाकर जल्दी सो जाता है कि सुबह उठकर उसे अगले दिन की तैयारी करनी होती है कौन कहा क्या बोल रहा है क्यों बोल रहा है ये तो उसे गली नुक्कड़ चौराहों पर पान चाय की दूकानों पर अपने अपने नेताओं की शेखी बखार रहे लोगो से पता चलता है और वही उन्हे समझाते भी है कि कौन नेता क्या बोला और उसका क्या मतलब है वो भी अपने पार्टी और नेता के हित के अनुसार ......... 
इस लिए आम जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता कि मोहन भागवत जी क्या बोल रहे हैं या कोई अन्य नेता क्या बोल रहा है.....
फिलहाल आइए बात करते है मोहन भागवत जी के व्यत्व्य की जिसकी चर्चा चल रही है मुझे लगता है भागवत जी जिस मंच से जिस महान व्यतित्व की जयंती पर बोल रहे थे और जो भी बोला उनका तात्पर्य सनातन समाज के विघटन को दूर करने की दूरदृष्टि का उदबोधन था न कि किसी वर्ग विशेष या समुदाय को नाराज करना या आरोपित करना.......... ..... 
वैसे इस बात में पुरी सत्यता है कि सनातन वैदिक व्यवस्था में जाति सूचक शब्द को कहीं भी ज्यादा महत्ता नही दिया गया है। ये तो समाज के कुछ मठाधीश लोगों ने समय समय पर अपने निहित स्वार्थ और अपनी महत्ता बनाए रखने के लिए समाज में नाकारात्मक माहौल पैदा किया वैसे पंडित और ब्राह्मण दोनों शब्दों का अर्थ स्थान कर्म और परिस्थिति के अनुसार बदल जाता है। जैसे पंडित शब्द आम बोल चाल में लोग बहुत जानकार अनुभवी व ज्ञानी व्यक्ति को भी बोलते है "चल बड़ा आई है पंडित बने आपन ज्ञान मत दा " ऐसे ही बहुत से अन्य शब्द है जिनका अर्थ संदर्भ बदल जाता है वाक्या अनुसार ........

वैसे भी जाति सूचक शब्द हमेशा से राजनितिक और व्यक्तिगत स्वार्थ साधने का माध्यम रहा है जिसका पिछले लगभग 1500 वर्षो से परंपरागत तरीके से भारत पर आक्रमण करने वाले विदेशी आक्रमणकरियों ने अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग किया, संतानियो को जाति में विभाजित करके लाभ उठाया और हजारों वर्षों तक राज किया, भारत की समृद्धि लुटा, संस्कृति संस्कार को तोड़ा मडोड़ा तहस नहस कर दिया और भारतीय सनातनी हजारों वर्षो तक ये समझ ही नही पाया, अपनी  समृद्धि और श्रेष्ठता के अहंकार से अपने आपको बाहर ही नहीं निकाल पाया ....... जो देश की स्वतंत्रता के बाद भी लगातार जारी रहा, अलग अलग राजनितिक नेता और पार्टियां समय समय पर सनातन समाज को एकजुट करने की बजाए अपने स्वार्थ और सत्ता के लालच में विघटित बनाए रखा जो देश और समाज के विकाश को प्रभावती किया और कमज़ोर बनाया है ............ 
आज आजादी के 75वे वर्ष बाद भी भारत संघर्ष कर रहा है विकसित देश की श्रेणी में अपना स्थान बनाने के लिए जिसे विक्रमजीत मौर्य के समय में पूरा विश्व सोने की चिड़िया के नाम से जानता था। बड़ा दुर्भाग्य यह है भारत से एक दो साल पहले या बाद में आजाद हुए कई देश आजादी के ३०-४० वर्षो के ही आर्थिक विकाश की ऊंचाई छू लिए थे और उत्तरोत्तर प्रगति के साथ आज़ एक विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व में अपना परचम फहरा रहे है जिसका सबसे बड़ा उदहारण हमारा निकटम पड़ोसी चीन है ........... 
यदि भारत आज भी संघर्ष कर रहा है तो उसके पीछे एक मुख्य कारण भारत की जातिवादी और क्षेत्रवादी राजनीत है इसी जातिवादी क्षेत्रवादी राजनीत के गठबंधन को तोड़ने और सनातन समाज को जोड़कर एक छत के नीचे खड़ा करने का प्रयास संघ प्रमुख की सोच है ............. 
संघ प्रमुख की इसी सोच में सनातन समाज का और भारत देश का हित है जो भारत को विश्व के समृद्धशाली राष्ट्र की श्रेणी में पुनः खड़ा कर सकता है। इस लिए देश के प्रत्येक नागरिक को अपने दृष्टिकोण का दायरा बढ़ाना होगा अपनी सोच को बड़ा करना होगा जाति और क्षेत्रवाद की संकीर्णता से बहार आना होगा। पूरा सनातन समाज का एक ही जाति है, वो है, सनातनी भारतीय। बस यही एक ही परिचय है समस्त भारतवासियो का सनातनियो का और कुछ नही। ये भावना भारत के प्रत्येक नागरिक की होनी चाहिए तभी एक सशक्त और समृद्धिशाली राष्ट्र का विकाश संभव हो पाएगा ........ 
हालाकि मोहन भागवत जी ने जो बात कहीं वो निश्चय ही बड़ा आश्चर्य का विषय है की इतना विद्वान सुलझा हुआ परिपक्व व्यक्ति देश के एक सर्वश्रेष्ठ संगठन का प्रमुख इतना गैर जिम्मेदारीपूर्ण व्यक्तव्य कैसे दे सकते है जबकि वे स्वयं एक ब्राह्मण परिवार से है लेकिन इतना बड़ा व्यक्तित्व यदि ऐसा बोल दिए तो उन शब्दों के आगे पीछे के वक्तव्यों और विषय स्थान व परिस्थिति को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए और उन संदेशों का वास्तविक संदर्भ क्या है उसको भी समझना चाहिए .......
भागवत जी के व्यकव्यो का विस्ताविक संदर्भ यही है की जो सनातनी अपने धर्म को छोड़कर किसी और धर्म को अपना लिया है वो घर वापसी करे जाती धर्म के कीड़े से बाहर निकले अपने सनातन समाज व धर्म का सम्मान करे। जिन लोगों से पहले कुछ गलतियां हुईं उसको सुधारे और सनातन समाज की एकता अखंडता को मजबूत बनाएं रखने के लिए अपना सर्व श्रेष्ठ योगदान करे। वैसे भी जाती धर्म से ऊपर मानवता और इंसानियत हैं जिसका जीवन में अनुकरण करना प्रत्येक सनातनी का कर्तव्य है।

इसलिए हम सबको राष्ट्रहित में जाति क्षेत्र के दायरे से बाहर निकल समाज में एकजुटता स्थापित करना चाहिए।
जय हिंद। जय भारत।। 

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Saturday, 4 February 2023

रामचरित मानस पर टिप्पणी केवल एक तुच्छ वोटबैंक राजनीत के अलावा और कुछ नही है

आजकल भगवान श्री राम के अनन्य भक्त और श्री हनुमान जी स्वामी के प्रत्यक्ष दर्शन करने व उनकी ही प्रेरणा से ऋषि वाल्मीकि द्वार संस्कृत भाषा में लिखित रामायण का हिंदी या कहें की अवधी में अनुवाद करने वाले संत तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरितमानस पर कुछ मूढ राजनेताओं  द्वारा निम्नस्तर की टिप्पणी की जा रही है जो बड़ी चर्चा का विषय बन गया है। 
वैसे आजकल के नेताओं को राजनेता कहना भी गलत होगा क्यों कि आजकल के नेता राजनीत नही करते है बल्कि स्वार्थनीति कूटनीति सत्तानिति वोटनिति करते हैं जो केवल सत्ता और समय के साथ चलते है ना कि जनता के साथ आज़ के नेताओं के लिए अपना स्वार्थ सर्व प्रथम और जनता व उनका हित सबसे अंत में ऐसे नेता तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस पर टिप्पणी करते है जो केवल हास्य उपहास  का विषय हो सकता इससे अधिक और कुछ नही ,.... .....
उत्तर प्रदेश के स्वामी प्रसाद मौर्य और बिहार के शिक्षा मंत्री द्वार हाल ही में की गई टिप्पणी केवल यह प्रणाम देती है कि ये कितने बड़े मूढ़ व अनपढ़ है इनकी पास केवल नाम मात्र की डिग्री है वास्तविक शिक्षा के नाम पर ये एकदम शून्य है मुझे तो संदेह है कि इन लोगो के घर में रामचरित मानस की एक प्रतिलिप भी रखी होगी और जब इनके घर में रामचरित मानस की प्रतिलिप नही तो इन्होंने ना तो कभी ध्यान से स्वयं पढ़ा होगा न ही परिवार के किसी सदस्य ने और बिना पढ़े व सही अर्थ समझे यदि ऐसी टिप्पणी स्वामी प्रसाद मौर्या ने किया तो यह केवल सत्ता नीति और वोटनिति से प्रेरित बयाना कहा जा सकता है ........... 
सामान्य रूप इसे पब्लिक और मीडिया स्टंट कह सकते है क्यों कि स्वामी प्रसाद मौर्या बसपा से भाजपा और फिर सपा में केवल उपमुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री बनने के लालच में उछाल कूद कर रहे है और सफल नहीं हो पा रहे है और इनकी इसी तरह की गलत बयानबाज़ी अनर्गल आरोप प्रत्यारोप ने इनके असली चेहरे को जनता के सामने उजागीर कर दिया है तो जनता में भी इनका असर अब कम होता नजर आ रहा है अब चूकि महत्त्वाकांछा बड़ी है और जनता में प्रभाव कम होता जा रहा हैं तो आने वाले समय में सभी पार्टियों में इनका महत्त्व एकदम खत्म हो जाएगा इस बात इस भी दर सता रहा है ऊपर से आजकल सत्ता से बाहर है तो जनता में भी कहीं उतना महत्त्व नहीं मिल रहा है जिससे इनको तथा कथित अपना वोट बैंक भी धीरे धीरे भूल रही है तो इनकी बेचैनी बढ़नी स्वाभिक है, हो भी क्यों नही जो व्यक्ति 1996 से लेकर 2017 तक अधिकतम समय में उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट का हिस्सा रहा भरपूर दौलत कमाया वास्तविक हैसियत 200 करोड़ से अधिक ही होगा ऐसा अनुमान है, तो अब मंत्रिपरिषद का हिस्सा न होने की पीड़ा भी है, बावजूद इसके इतना बड़ा वोहदा रखते हुए 2017 विधान सभा का चुनाव भी हार गए ये तो अखिलेश यादव जी ने मान रखा और विधान परिषद में भेज दिया नहीं तो शायद अब तक राजनीत भूल चुके होते।
अब चूंकि लोकसभा नजदीक आ रहा है हो सकता है चुनाव लडने तैयारी कर रहे हो तो अपने वोटबैंक को याद दिलाना भी जरूरी था कि स्वामी प्रसाद मौर्या अभी प्रदेश की राजनीति में जीवित है तो इससे बड़ा गरम मुद्दा और कुछ हो ही नही सकता था तो इस मूढ़ ने बिना गहन अध्ययन किए अपने सलाहकारों के कहने पर इतना मूढ़ता भरा बयान दे दिया जबकि ये कई वर्षो पहले ही बौद्ध धर्म अपना चुके है। 
सही ही कहा गया है अधिक महत्त्वाकांछ व्यक्ति को अक्सर अंधा बना देता है या ये कहें कि विनाश काले विपरीत बुद्धि यही हो रहा है स्वामी प्रसाद के साथ ..... यही कारण है कि 2017 विधानसभा से पहले मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र देकर सपा में शामिल हुए और अब इतना बड़ा गलत बयानबाज़ी वो भी सनातन धर्म के सबसे बड़े महाकाव्य रामचरित मानस पर टिप्पणी ..... 
इस मूढ़ ने रामचरित मानस के पंचम खंड सुंदरकांड के ५८ वें दोहा के अंतर्गत आने वाले ३ चौपाई 
ढोल गंवार शूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
पर अपनी टिप्पणी की है 

इन मूर्खो को शूद्र और ताड़ना शब्द का विरोध है तो सबसे पहले तो ये ऋषि वाल्मीकि का ही विरोध कर रहे है जो कि स्वयं शूद्र जाति से थे और इतने बड़े विद्वान थे कि भगवान श्री राम के जन्म से पहले से ही रामायण लिखना उन्होंने शुरु कर दिया था और लव कुश के जन्म और बाल्यकाल तक का पूरा विवरण लिख दिया था तो क्या रामायण का बहिष्कार इस लिए कर देना चाहिए की वो एक शुद्र कुल में जन्मे ऋषि ने लिखा था जिसका हिंदी अनुवाद रामचरित मानस है जिसके बारे ये कहा जाता है कि स्वयं हनुमान जी ने एक तोता के रूप में तुलसीदास जी को सुनाया और उन्होंने लिखा प्रभू श्री राम का भी दर्शन प्राप्त किया था जो केवल ५०० वर्ष पुरानी घटना है। 
और दूसरी बात ताड़ना का अर्थ किसी को पीटने पीड़ा देने या प्रताड़ित करने से नही है बल्कि ताड़ना का वास्तविक अर्थ है 
गवार शुद्र पशु और स्त्री पर हमेशा ध्यान दृष्टि बनाए रखना सामान्य भाषा में कहे तो निगरानी रखना क्यों कि इस संसार में प्रत्येक प्राणी के अपने अपने कुछ नैसर्गिक गुण व संस्कार होते है जिसके अनुसार उनका व्यवहार होता है और कहीं उनसे कोई गलती न हों जिससे हमें पीड़ा हो इस लिए उनके ऊपर दृष्टि बनाए रखना और समय पर समय पर उचित शिक्षा देना आवश्यक होता है इस लिए ताड़न के अधिकारी शब्द का प्रयोग किया गया है । 

स्वामी प्रसाद मौर्या के बयान से अधिक तो इस बात को ध्यान देने की जरूरत है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव जी ने उनको इस बयान पर पुरस्कृत करते हुए पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया, इसी को कहते है वोटनीति  कूटनीति अब यदि सवर्ण समुदाय या भगवान राम भक्त स्वामी प्रसाद के बयान पर विरोध प्रदर्शन करे तो मौर्य जाति के व्यक्ति का अपमान मतलब की पूरे मौर्य समाज का अपमान जिसे मुद्दा बनाके मौर्या समाज के वोट बैंक को विभाजित करना और स्वामी प्रसाद को समाज का बड़ा नेता साबित करना जिसका कुछ फायदा सपा को मिले आगामी लोकसभा चुनाओ में संभवतः ..........
लेकिन इन मूढ़ को कौन समझाए की आज के डिजिटल सोशल मीडिया के जमाने में जनता या किसी समाज को बहलाना आसान नहीं रहा और वो भी सनातन धर्म की बखिया उखेड़ के तब जब ५०० सौ वर्ष पुराना राम मंदिर निर्माण शुरु हो गया है सनातन धर्म के श्रद्धालु बड़ी संख्या में इस बात को लेकर खुश है जो रामलला के दर्शन की राह देख रहे जो संभव है लोकसभा चुनावों से पहले शुरु हो जाएगा ऐसी स्थिति में सनातन समुदाय को तोड़ना आसान नहीं

वैसे भी स्वामी प्रसाद मौर्य ने विधान सभा चुनाव से पहले राम भक्त श्री हनुमान जी के चालीसा पर गलत बयान देकर अखिलेश और स्वयं दोनो को चुनाव में पराजित कराया और अब श्री राम चरित मानस पर टिप्पणी करके पहले से ही लोकसभा चुनाव में सपा को हराने की तैयारी कर लिया उससे भी बड़ी संभावना है बेटी संघमित्रा की राह कठिन पिछली बार तो मोदी जी के नाम पर चुनाव जीत संसद में पहुंच गई थी इस बार तो लग रहा है स्वामी बेटी को भी हार की राह दिखा देंगे।
स्वामी प्रसाद जैसे नेताओं को आत्मिक शुद्धि की जरुरत है इन्हे किसी अध्यात्मिक गुरु के शरण में कुछ महीने व्यतीत करना चाहिए जिससे इनका सनातन धर्म के बारे में ज्ञान बढ़े और स्वयं से ये रामचरित मानस और इनसे जुड़े ग्रंथो का अध्यन करना चाहिए और यदि सही से न समझ आए तो किसी विद्वान व्यक्ति से रामचरित मानस के लिखे चौपाइयों का अर्थ समझना चाहिए। 

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Thursday, 2 February 2023

बजट २०२३-२४ भारत को विश्व पटल पर वर्ष २०४७ में विकसित देश की श्रेणी में स्थापित करने का पहला कदम है

बजट २०२३- २४ मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का अंतिम बजट है क्यों कि अगले वर्ष देश में लोकसभा चुनाव होना है लोगो को बहुत उम्मीद थी सरकार जनता को लुभाने के लिए बहुत लोकलुभावन बजट पेश करेंगी लेकिन मोदी जी देश को स्वतंत्रता के १००वें वर्ष में विकसित राष्ट्र की श्रेणी में खड़ा करने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए संकल्पित होकर कार्य कर रहे है जिसकी झलक बजट २०२३ - २४ साफ दिखाई दे रहा जो आने वाले समय में विकसित व आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला साबित होगा। इसका एक बड़ा उदहारण वित्त मंत्री ने सरकार पर सब्सिडी का बोझ कम करते हुए ऐतिहासिक निचले स्तर पर ला दिया है।
देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा प्रस्तुत बजट २०२३-२४ भारत को स्वावलंबी आत्मनिर्भर नव भारत के निर्माण को सुनिश्चित करने वाला बजट है जो भारत को स्वतंत्रता वर्ष २०४७ में विश्वपटल पर एक विकसित और शसक्त राष्ट्र के रुप में स्थापित कर वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। बजट में समाज के अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति को लाभ पहुंचाने से लेकर चहुंमुखी विकास को गांव देहात तक पहुंचने की भरपूर प्रयास किया गया है चाहे गरीब हो, मजदूर हो या किसान या मध्यमवर्गीय वर्ग से संबंध रखने वाला देश का कोई भी नागरिक हो सबका ध्यान रखा गया है युवाओं के लिए रोजगार सृजन से लेकर महिलाओं के लिए किसान विकास पत्र के तर्ज पर महिला बचत सम्मान पत्र की व्यवस्था जिसमें ७.५% व्याज के साथ पार्शियल विड्रवाल का प्रावधान किया गया है और बुजर्गो के लिए बचत इनकम को टैक्स फ्री करने के साथ ही देश को ग्रीन एनर्जी समृद्ध राष्ट्र बनाने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था किया गया है जो भारत को विश्व में एक मजबूत पहचान दिलाने में अहम भूमिका अदा करेगा।
४५ लाख करोड़ रुपए के बजट में राजकोषीय घाटे को पिछले वर्ष की अपेक्षा ६.५ से घटाकर ५.९% करना एक महत्वपूर्ण दूरदृष्टि परक कदम है जो यह दर्शाता हैं की भारत की अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ रहा है जिसे २०२५_२६ के बजट में ४.५% रखने की व्यवस्था अभी से किया गया है जो आने वाले समय में देश की अर्थव्यवथा को और मजबूत करने का मोदी सरकार का दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है केवल इतना ही नहीं ७५ हजार करोड़ से एक नए फ्रेट कॉरिडोर बनाने व देश की परिवहन व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए ९ हजार करोड़, एमएसएमई सेक्टर को क्रेडिट गारंटी योजना और २० लाख करोड़ पशुपालन डेरी एवं मत्स्य उद्योग को मजबूत करने की व्यवस्था यह बताती है की मोदी सरकार देश के व्यापारियों को हर कदम पर सहयोग करने के लिए संकल्पित है।
देश की सीमा सुरक्षा हो या नागरिक सुरक्षा उसको मजबूत बनाए रखने के लिए रक्षा बजट में पिछले वर्ष की अपेक्षा १३% की बढ़ोत्तरी कर ५.९४ करोड़ कर दिया जिससे देश रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बने और सीमा पर तैनात सैनिकों को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस बनाया जा सके साथ में गृह मंत्रालय को १.९४ लाख करोड़ के बजट का प्रावधान कर सरकार नागरिक सुरक्षा को भी और मजबूत करने के लिए संकल्पित है। 
सड़क परिवहन व राजमार्ग के नेटवर्क को और मजबूत करने के लिए २.७० लाख करोड़ का प्रावधान न केवल देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करेगा बल्कि बड़े पैमाने पर देश के कोने कोने में रोजगार का सृजन करेगा। फार्मा उद्योग में निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए १२५० करोड़ का प्रावधान, प्रधानमन्त्री गरीब आवास योजना में लगभग ६६% की बढ़ोत्तरी कर ७९ हजार करोड़ कर दिया गया जिससे अधिक से अधिक गरीबों को आवास मुहैया कराया जा सके। 
कार्बन एमिशन को कम करने के लिए संकल्पित मोदी सरकार फेम योजना को २२०० करोड़ से बढ़ाकर लगभग ५२०० करोड़ कर दिया जिससे इलेक्ट्रिक विहकल के उत्पादन को बढ़ावा मिले साथ ही इलेक्ट्रिक व्हीकल ने प्रयोग होने वाले उत्पादों जैसे लिथियम बैटरी पर टैक्स कम करके यह कोशिश किया है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल खरीदारों को सस्ते दामों पर गाडियां उपलब्ध हो पाए। नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन २०७० के लक्ष्य को पाने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ३५ हजार करोड़ का प्रावधान हरित भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है जो देश में हाईड्रोजन से चलने वाली पहली ट्रेन का परिवहन २०२४ तक शुरू करने का लक्ष्य प्राप्त करने में लाभदायी होगा।

मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चो की शिक्षा को मजबूती प्रदान करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय स्थापित करने का प्रावधान किया है साथ ही साथ पंचायत स्तर पर पुस्तकालय को स्थापित करने के लिए ग्राम स्तर पर प्रोत्साहन करने की योजना बनाई गई है जो निःसंदेह कमजोर व मध्यम वर्गीय छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है। ४७ लाख युवाओं को अगले तीन वर्षों में राष्ट्रिय अप्रेंटीशिप प्रोत्साहन योजना के तहत भत्ता का प्रवधान स्किल्ड बेरोजगार युवाओं के लिए एक बड़ी सहायता साबित होगा।

जल ही जीवन है जल संरक्षण के लिए जनजीवन मिशन योजना के लिए ७० हजार करोड़ का प्रावधान कर घर घर नल से जल सुनिश्चित करने की दिशा में सरकार का दृढ़ संकल्प स्पष्ट दिखाई दे रहा हैं। जनजातीय बच्चो के लिए एकलव्य आवासीय विद्यालय योजना के तहत २००० विद्यालयों की संख्या ५९४३ कर दिया गया जिसके तहत ३८००० नए शिक्षको के भर्ती का प्रावधान किया गया है जिससे पिछड़े जनजातीय समुदाय के बच्चो को देश के कोने कोने में अच्छी शिक्षा सुनिश्चित हो सके।  
इस प्रकार से यह बजट मोदी जी के सपनो का आत्मनिर्भर स्वावलंबी भारत की परिकल्पना को जमीनी स्तर पर स्थापित करने का एक सुदृढ़ बजट है जिसमे हर वर्ग के लिए लाभ को सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है जिससे देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो रही है और विकास की रफ्तार भी तेज होती दिखाई दे रही है।

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Saturday, 14 January 2023

क्या भारत जोड़ो यात्रा के सहारे सत्ता वापसी का राहुल गांधी का जीवट प्रयास सफल होगा

भारत जोड़ो यात्रा अब लगभग अपने अन्तिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है वर्तमान में देश के पंजाब राज्य से गुजर रही है जहां सत्ता में पुनः लौटने के उद्देश्य से कांग्रेस ने 2019 में एक बड़ा किसान आंदोलन किसान बिल वापसी को लेकर किया था लेकिन उड़ता पंजाब के प्रभाव में वह निष्प्रभावी रहा और जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया लेकिन दुर्भाग्यवश मदहोश व्यक्तित्व को सत्ता मिल गईं जो पंजाब को और तीव्र गति से उड़ा रहा है फिलहाल यात्रा अब अपने अंतिम पड़ाव जम्मू काश्मीर में पहुंचने वाली है जहां अनुच्छेद 370 का प्रभाव खत्म हो चुका है और अब यह क्षेत्र दो हिस्सों जम्मू कश्मीर और लद्दाख में बंट चुका है तो निश्चय ही राहुल जी कुछ बड़ा उद्बोधन जम्मू कश्मीर की धरती से लाल चौक पर झण्डा फहराने के समय करने वाले होंगे जिसे सुनने को देश बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है.........

निःसंदेह राहुल जी की यह यात्रा सुषुप्त अवस्था में पड़ी ए ओ हुम द्वारा स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसे इंदिरा जी के नेतृत्व में एक नया नाम कांग्रेस (आई ) मिला, के कार्यकताओं को नई ऊर्जा और उम्मीद की किरण देगा लेकिन राहुल जी और उनके मेंटोर जयराम रमेश, रघुराम राजन व शुभचिंतकों का यह प्रयास 2023 में होने वाले 10 राज्यों मध्य प्रदेश राजस्थान छत्तीसगढ़ कर्नाटक तेलांगना मेघालय मिजोरम त्रिपुरा सिक्किम और जम्मू काश्मीर लद्दाख के चुनाव और 2024 के आम चुनाव में कितना लाभ दिला पाएगी ये तो आने वाला समय ही बताएगा .............. 

जो भी हो 2012 से लगातार लगभग 40 से अधिक चुनावी शिकस्त खाने के बाद भी राहुल जी भारत जोड़ो यात्रा का नेतृत्व कर रहे है यह उनके मजबूत इरादे, इच्छाशक्ति, संघर्षशीलता और जीवटता का एक अनूठा उदाहरण है जो लगभग हासिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस पार्टी को केंद्रीय सत्ता में पुनः लौटाने में महत्वपूर्ण योगदान साबित हो सकती है लेकिन राहुल जी की यह यात्रा कितनी सकारात्मक परिणाम देंगी यह तो आगामी महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव के परिणाम से ही पता चल पाएगा और तभी यह तय हों पाएगा की कांग्रेस 2024 में केंद्रीय सदन में कितनी मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज करा पायेगी ........ 
फिलहाल कांग्रेस का केंद्रीय सत्ता में लौटाने की उम्मीद तो कम ही लग रही है क्योंकि जनता जनार्दन उतनी उत्सुकता और भारी मात्रा में भारत जोड़ो यात्रा से नही जुड़ पाई जितना आवश्यकता थी ......

वैसे मुझे लगता है यात्रा का नाम "भारत जोड़ों यात्रा" रखने की बजाए यदि केवल "भारत यात्रा" रखा होता तो ज्यादा अच्छा रहता क्योंकि "जोड़ो" शब्द ने जनता में नकारात्मक राजनीति का संदेश दिया और भारत के कई राज्य उत्तराखंड उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड पश्चिम बंगाल उड़ीसा नॉर्थ ईस्ट और गुजरात तमिलनाडु गोवा जैसे राज्यों में यात्रा का एक भी पड़ाव नहीं रहा जो राहुल जी के यात्रा रूट मैप से बाहर रह गए इस प्रकार भारत का लगभग आधा राज्य तो यात्रा से अछूता रह गया तो भारत जोड़ो का सकारात्मक निहतार्थ ही ख़त्म हो गया ....... और एक बड़ा प्रश्न यह कि भारत जोड़ो नाम का तात्पर्य देश जोड़ना था या जाति धर्म व विभिन्न सम्प्रदाय को, जो भी रहा हो जब देश के सभी राज्यों में राहुल जी अपना पड़ाव नहीं लगा सके तो भारत जोड़ो का कार्य कहा पूरा हो पाया और यदि कांग्रेस को लगता है की पूरा हुआ है तो दूसरा बड़ा प्रश्न यह कि सरदार पटेल जी ने 1947 में क्या अधूरा छोड़ा था जो कि अब पूरा करने की जरूरत पड़ी राहुल जी को जिसे नेहरु इंदिरा और राजीव जी नही कर पाए। यदि कुछ छूट भी गया था तो मनमोहन जी के नेतृत्व में यूपीए सरकार के दौरान 2004 से 2014 में क्यों पूरा नहीं कर पाए जबकि मनमोहन जी तो सोनिया और राहुल जी के नेतृत्व में ही कार्य कर रहे थे। फिर भी यदि भारत जोड़ने का कार्य करना ही था तो यात्रा का रूट मैप पूर्व में पश्चिम बंगाल से शुरू करके पश्चिम में गुजरात होते हुए महाराष्ट्र गोवा कर्नाटका केरल तमिलनाडु तेलंगाना आंध्र छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश राजस्थान हरियाणा पंजाब हिमाचल होते हुए अंतिम पड़ाव जम्मू रखना था जिसमे भारत के लगभग 90% हिस्से की यात्रा सुनिश्चित हो जाती और जनता में एक सकारात्मक संदेश जाता कि देश का एक जुझारू नेता देश की अधिकतम आबादी तक अपनी पहुंच बनाने का संभव प्रयास कर रहा है  जिससे अधिक से अधिक जनता जुड़ पाती .... ...... 
खैर यात्रा रूट मैप से उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड पश्चिम बंगाल उड़ीसा जैसे बड़े आबादी वाले भूभाग को बाहर रखकर देश की 65% आबादी से सम्पर्क न कर पाना कहा से भारत जोड़ो अभियान पूरा कर पा रहा है जहां से लोकसभा में लगभग 200 से अधिक सांसद सदस्य सदन का प्रतिनिधि करते है ....... .... 
वैसे राहुल जी ने यात्रा के दौरान महत्मा गांधी जी के रियल उत्तराधिकारी की भुमिका निश्चित तौर पर अदा की है राहुल जी के हर पड़ाव पर उनके मुख्य सहयात्रियों में अक्सर महिला सहयात्री ही ज्यादा रही जैसे गांधी जी अपने यात्रा में हमेशा दो चार महिला सह यात्रियों के कंधो पर हांथ रखकर चलते थे जो राहुल जी के विरोधियों के लिए एक अच्छा मसाला बन गया ....... इसके अलावा यात्रा के दौरान ठंड के मौसम में राहुल जी का एक पतले t-shirt में यात्रा करना जनता के लिए एक अच्छा मजाक बन गया है ठंड न लगने के कारण पर भी बहुत सारी चर्चाएं जनता में हो रही है .... .

जो भी हो यात्रा का निर्णय तो अच्छा था लेकिन यात्रा का नामकरण, यात्रा की शुरुवात स्थान, रूट मैप, महिला सहयात्रियों की संख्या, एक बड़े भूभाग को अधूरा छोड़ना, यात्रा का ड्रेस कोड, सब कुछ नकारत्मक रहा है जिससे मुझे लगता है यात्रा की सफ़लता अधूरी रही है ..............
फिर भी ईश्वर से प्रार्थना है की वो राहुल जी संघर्ष जारी रखने आत्मबल प्रदान करते रहे और राहुल जी का संघर्ष सफल हो। 


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Friday, 30 December 2022

इक्कीसवीं सदी में मां शब्द और मातृत्व के आस्तित्व को चरितार्थ करने वाली हीराबेन बा और नरेन्द्र मोदी

देश के यशश्वी प्रधानमंत्री की देवतुल्य माता हीराबेन मोदी जी की दिव्य आत्मा पंचतत्व से बने दैहिक जैविक शरीर में 100 वर्ष तक एक सशक्त महिला पत्नी और मां के रुप में समाज में एक मजबूत छवि स्थापित करने के पश्चात आज ब्रह्ममुहूर्त में गोलोक की यात्रा पर निकल गई जिनके मातृत्व प्रेम की चर्चा हम सब लोग जब से नरेन्द्र मोदी जी प्रधानमंत्री पद की शपथ लिए है तब अक्सर सुनते रहें है खास तौर पर जब मोदी जी अपने जन्मदिवस पर उनसे आशीर्वाद लेने जाते या माता जी के जन्मदिवस पर उनसे मिलने उनका कुशलक्षेम पूछने जाते......
जो भी हो मोदी जी ने पिछले आठ सालों में पूरे देश की युवा पीढ़ी और समस्त जनमानस को मातृत्व प्रेम आशीर्वाद व अस्तित्व का जो संस्कार देश के प्रधानमंत्री के रूप प्रेषित किया है वो  निःसंदेह सराहनीय है और मैंने ऐसा महसूस किया है कि देश में मातृशक्ति के प्रति लोगो का दृष्टि पिछले कुछ वर्षों में बदला और सम्मान भी बढ़ा है। हीराबेन के सांसारिक जीवन के अंतिम यात्रा में एक प्रधानमंत्री के रुप में उनके अर्थी को कांधा देकर मोदी जी ने देश वासियों को अपने कर्तव्य निर्वहन का बहुत बड़ा संदेश दिया है।

वैसे तो सनातन संस्कृति में मातृत्व का बहुत आदर सत्कार और सम्मान एक जननी के रूप में वैदिक काल से ही बताया गया है लेकिन मोदी जी ने आज इक्कीसवीं सदी में मातृत्व के सम्मान में अपने व्यवहार से देश व समाज को जो सन्देश दिया है वह निःसंदेह प्रेरणादायक है।
मोदी के अनुसार हीराबेन ने अपने अंतिम मुलाकात में मोदी से "अपने कर्तव्यों को बौद्धिक क्षमता से और जीवन को शुद्धता से जीने का मंत्र दिया "

ईश्वर पुण्य आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान प्रदान करे।
ॐ शांति। ॐ शांति। ॐ शांति।। 


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Wednesday, 14 September 2022

गर्व से कहो हम हिंदी भाषी है और हिंदी हमारी आत्मीय भाषा है

आज हिंदी दिवस है तो सोचा कुछ हिन्दी पर ही लिख दिया जाए ......
सही पूछिए तो हिन्दी के बिना कोई भी भारतीय अपनी भावनाओं को सही मायने में नहीं व्यक्त कर पता है .... हम ये भी कह सकते है दिल की बात प्यार दुलार अपनेपन की बात जितना सरल और अच्छे तरीके से हम अपने क्षेत्रीय भाषा चाहे वो पंजाबी गुजराती मराठी हो या बंगला हो, या उड़िया या तमिल तेलगू या हो अवधी या मैथिली या हो मलयाली या कन्नड़ में व्यक्त कर सकते है उतना आंग्ल या अंग्रेज़ी भाषा में नहीं ........
हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा में जो आत्मीयता या अपनापन है वो किसी और में नहीं उदाहरण के तौर पर देखे कि अंग्रेजी भाषा में केवल एक ही शब्द Uncle - Aunty से ही चाचा चाची मामा मामी फूफा बुआ मौसा मौसी सबको संबोधित कर दिया जाता है सब एक ही समान है चाहे बड़े हो या छोटे कोई सम्मान या प्यार या लगाव का भाव नहीं और मजेदार बात यह है की यदि सारे लोग एक साथ खड़े हो तो एक बड़ी फजीहत हो जाती है पांच बार बोलो और इशारे करो तब समझ आएगा की किस Uncle - Aunty को बुला रहे है आप .........
इसी प्रकार अन्य रिश्तों में है पिता जी माता जी कहने में जो आत्मीयता, प्यार व सम्मान का भाव हैं वो Daddy, Mummy कहने में नहीं है। वैसे भी Daddy Mummy दोनो शब्द मृत भाव को प्रेषित करते है कहने का अर्थ है की अंग्रेजी भाषा में हम माता पिता को ऐसे शब्दों से पुकार कर उनके सकारात्मक ऊर्जा को दूषित ही कर रहे होते है इससे उनकी आयु व स्वास्थ्य को प्राभावित कर रहे होते है आप...........
क्या अध्यापक को Teacher कहना और Teacher नाम का दारू पीना दोनों में कोई अपनापन लगाव व सम्मान है जो आचार्या जी या गुरु जी कहने में ..........

अब यदि बात करे दैनिक जीवन में व्यवहारिक रूप से प्रयोग होने वाले कुछ अन्य अंग्रेजी शब्दो का जैसे......
Congratulations, Best Wishes " हार्दिक बधाई मित्र, बहुत बहुत शुभकामनाएं "
Thank You को "आभार भाई साहब" / मित्र
Wish You Happy Birthday, God Bless You or Stay Blessed को " जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं मित्र/ भाई, ईश्वर आपको दीर्घायु बनाए " कहते है।
आप महसूस करेंगे की ज्यादा अपनापन किस भाषा में लग रहा है।
इसी तरह किसी के मृत्यु पर दुःख प्रकट करने के लिए व्यवहारिकता निभाने के लिए लोग अक्सर RIP Rest in Peace बोल देते है या लिख देते है वैसे तो अब लोगों को social media के माध्यम से इस शब्द का सही अर्थ तो पता चल गया है फिर भी लोग यही शब्द प्रयोग करते है लेकिन जब यही हम अपने भाषा में बोले तो भाव बदल जाता है " बहुत दुखद घटना, ईश्वर पुण्य आत्मा को अपने श्री चरणों मे स्थान प्रदान करे" ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति।।
जरा पढ़ के देखिए कितनी आत्मीयता हिन्दी शब्दो में महसूस हो रहा हैं।
ऐसे बहुत उदाहरण है जिसकी हम यहां चर्चा कर सकते है लेकिन बहुत लंबा हो जायेगा
यहीं नहीं मैने स्वयं कई बार ऐसा महसूस किया है यहां facebook पर लिखते समय जब मैं अंग्रेज़ी में कुछ लिखता हूं तो वो भाव नहीं प्रेषित कर पता हूं जो हिन्दी भाषा में .......
मैं ही नही मैने बड़े बड़े पत्रकारों और अधिकारियो को देखा है वे अपने भाव हिंदी भाषा में ही व्यक्त करना ज्यादा सुगम समझते है जो स्वाभाविक ही है ......
यही नहीं आप संस्कृत के श्लोक को या हिन्दी गीत को सुनकर ज्यादा शांत और आनंदित महसूस करते है बजाय अंग्रेज़ी गीत के ..........
केवल यही नहीं मैने कई बार ऐसा देखा है जब job interview के लिए कोई उम्मीदवार HR Manager ya Team Manager के सामने ज्याता है वो कोशिश करता है की कितना जल्दी वह अंग्रेज़ी से हिंदी में संवाद शुरू कर सके क्यों कि हिंदी में वो अपने बातो कामों हुनर और उपलंधियो को ज्यादा सरलता से भावात्मक रूप से कह पता है और सामने वाले को प्रभिवित करने में उसे ज्यादा आसानी होती यही नहीं अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी में वो ज्यादा संवाद स्थापित कर पता हैं साक्षात्कार लेने वाले व्यक्ति से,..........

वैसे भी आप अंग्रेजी में लिखकर या बोलकर कुछ लोगो को प्राभावित तो कर सकते है लेकिन संवाद स्थापित करने वाले व्यक्ति को अपना तभी बना पाएंगे जब आप उनसे हिन्दी में भाव व्यक्त करेंगे, संवाद करेंगे, क्यो कि अपनी भावनाओं को आप जितनी सहजता सुगमता सरलता से हिंदी में व्यक्त कर पाएंगे जो सामने वाले के दिल और दिमाग में आपकी एक अच्छी छवि बना सके वो अन्य भाषा में संभव नहीं है
इस लिए मेरा तो यही कहना है कि अंग्रेजी भाषा को केवल official भाषा तक ही सीमित रखें और व्यावहारिक ब वक्तिगत जीवन में हिन्दी भाषा या मातृ भाषा को ही उपयोग में लाए तो ज्यादा अच्छा है और ये केवल अपने तक ही सीमित ना रखें बल्कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे बच्चो को भी समझाए की अंग्रेजी स्कूल और प्रतियोगिता तक ही सीमित रखें।
जय हिंद जय भारत ।।
आप सभी मित्रों को हम भारतीयों की मातृ भाषा हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।। 💐💐🙏

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Monday, 12 September 2022

राजधानी दिल्ली का राजपथ मार्ग अब कर्त्तव्य पथ के नाम से जाना जाएगा

देश की राजधानी दिल्ली के लुटियन जोन में स्थित राजपथ मार्ग अब "कर्त्तव्य पथ" के नाम से जाना जाएगा। निःसंदेह नरेन्द्र मोदी जी और उनकी सरकार का यह एक अच्छा निर्णय है। जो मार्ग से गुजरने वाले सांसदों मंत्रियों अधिकारियों व अन्य नेताओं को उनके कर्तव्यों का कम से कम रोज एक बार एहसास तो कराएगा ....
क्योंकि मैंने अक्सर बड़े बुजुर्गो से सुना है नाम का असर उससे जुड़े व्यक्ति के व्यक्तित्व पर जरूर पड़ता है इसका एक उदाहरण हम ऐसे ले सकते है विवेकानंद जी का नाम भी "नरेंद्र" था और उन्होंने भारत को विश्व में वैदिक सनातन धर्म के प्रचार के माध्यम से एक उच्चस्तरीय कीर्ति दिलाई और अब देश के प्रधानमंत्री भी नरेंद्र मोदी जी है जो अपना पूरा प्रयास भारतीय संस्कृति और सभ्यता को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने के लिए पूरी कोशिश कर रहे है इसका एक बड़ा उदाहरण है संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा योग दिवस 21जून को मान्यता देना और विश्व स्तर पर योगदिवस का आयोजन होना।

इसी प्रकार हो सकता है राजपथ का नाम अब कर्तव्य पथ होने पर उसके प्रभाव स्वरुप मार्ग से गुजरने वाले देश के जिम्मेदार व्यक्तियों की भी कर्व्यप्रणायता जागृत हो और भारत का विकास और जनकल्याणकारी कार्य और तेजी से संभव हो पाए ... हालाकि इसके लिए दृढ़ इस्छाशक्ति व सही नियति का भी होना बहुत जरूरी है ......
फिर भी हम उम्मीद तो कर ही सकते है शायद नाम का असर प्रभावकारी हो और ..... .......... कुछ नया परिर्वतन देखने को मिले आने वाले समय में .......
वैसे भी राजपथ तो राजाओं के लिए होता था आजादी के बाद जब राजशाही व्यवथा खत्म हो गई तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजपथ की क्या आवश्यकता रही। अब तो उस परिक्षेत्र में रहने वाले और उस मार्ग से गुजरने वाले लोगो को तो अपने कर्तव्यों का याद रहना ज्यादा आवश्यक है। ना कि राजशाही का एहसास होना .......
वैसे भी शायद राजपथ नाम का ही असर था की देश तो राजशाही व्यवस्था से आजाद तो हो गया था लेकिन आजादी के बाद के नेता संसद में पहुंचने के बाद अपने आपको किसी राजा से कम नहीं समझते है ........ और साउथ ब्लाक नॉर्थ ब्लॉक में तैनात अधिकारियों का भी अमूमन यही हाल है .... ......

काश देश के सदन में उपस्थित सभी प्रतिनिधि और मंत्रालय में उपस्थित सभी अधिकारीगण ये समझपाते की राजपथ पर चलने से वे राजशाही व्यवस्था के अंश नही बल्कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था के कर्मयोधा है ...... और देश का विकास व जनता का भविष्य उनके हाथ में है जिसे सुनिश्चित करना उनका कर्तव्य है लेकिन राजशाही व्यवस्था का आनंद लेने के आदि बने संसद प्रतिनिधियों व
अधिकारियों ने ईमानदार तरीके से कभी काम ही नहीं किया।

उम्मीद है कि शायद कर्तव्य पथ का सकारात्मक प्रभाव लोगो पर पड़ेगा और देश के नेताओ व अधिकारियों के अंदर कुछ नया परिर्वतन देखने को मिलेगा।।

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Wednesday, 7 September 2022

कौन है ईश्वर ? क्या आपने कभी देखा

कौन चलाता है इस पूरे संसार को ? कहाँ है ईश्वर ? क्या कभी देखा, कभी महसूस किया ? नही ना 
आइए समझने की कोशिश करते है 

जब हम माँ के पेट में नौ महीने तक थे, कोई हाथ—पैर न थे कि हम भोजन कर ले। 
श्वास लेने का भी उपाय न था,
फिर भी जिए। 
न कोई दुकान चलाते, न कोई काम धंधा करते थे, फिर भी जिए।

नौ महीने माँ के पेट में हम थे, कैसे जिए ? 
किसकी मर्जी से जिए ?
तुम्हारी मर्जी क्या थी ?
कुछ नही पता ?
फिर माँ के गर्भ से जन्म हुआ , जन्मते ही, जन्म के पहले ही माँ के स्तनों में दूध भर आया, कैसे 
किसकी मर्जी से ?
अभी दूध को पीनेवाला
आने ही वाला है कि
पहले से ही दूध तैयार है,
किसकी मर्जी से ? कौन है वो ?
गर्भ से बाहर होते ही
तुमने सांस ली कभी इसके पहले
साँस नहीं ली थी 
जब माँ के पेट में
तो माँ की साँस से ही
काम चलता था—
लेकिन जैसे ही तुम्हें
माँ के पेट से बाहर होने का
अवसर आया,
तत्क्षण तुमने साँस ली,
किसने सिखाया ? कौन है वह 
जब की पहले कभी सांस नहीं लिया था
किसी पाठशाला में नहीं गए थे,
किसने सिखाया कि कैसे साँस लो ?
किसकी मर्जी से ?
जो तुम दूध पीते थे कौन पचाता था , तुम्हारे भोजन को ?
तुम्हारे ग्रहण किए हुए भोजन को हड्डी—मांस—मज्जा में कौन बदलता है ? कैसे तुम साल दर साल तुम बड़े होते जाते हो तुम्हारा शारीरिक सौष्ठव बनने लगता है।
किसने तुम्हें जीवन की
सारी प्रक्रियाएँ दी हैं ?
जब तुम थक जाते हो 
तो कौन तुम्हें सुला देता है?
और कौन जब तुम्हारी
नींद पूरी हो जाती है तो
तुम्हें उठा देता है?
कौन चलाता है चाँद—सूर्यों व अन्य ग्रह नक्षत्र को ? सूर्योदय से सूर्यास्त फिर सूर्योदय 
किसकी इच्छा से सब संभव हो रहा है सदियों से 
पौधों वृक्षों को हरा कौन रखता है ?
कौन खिलाता है पौधों वृक्षों में फूल फल को 
अनंत—अनंत रंगों के
और गंधों के ? 
कौन भरता उनमें सुगंध व स्वाद ?
संसार की प्राकृतिक गतिविधियों को कौन संचालित करता है 
कभी सोचा ? नहीं ना 
जिस स्रोत से ये पूरा ब्रह्माण्ड संचालित हो रहा है,
क्या उसके बिना सहारे के 
एक पल भी हमारी छोटी—सी जिंदगी चल सकेगी ?
कभी कार को ड्राइव करते सोचा है की थोड़े से अंदाज से गाड़ी कैसे निकल जाती है आगे 
कोई न कोई अदृश्य शक्ति ऊर्जा ड्राइवर को मार्गदर्शन कर रही होती है 
थोड़ा सोचो,
थोड़ा ध्यान करो।
अगर इस विराट संसार को
बिना किसी व्यवधान के 
चलते हुए हम देख रहे है,
सब सुंदर तरीके से चल रहा है,
कोई न कोई अदृश्य शक्ति तो है 
वो कौन है ? 
जिसे हम देख नहीं सकते केवल महसूस कर सकते है 
ईश्वर वही है जो 
ईश्वर दिखता नही देता बल्कि दिखाता है
ईश्वर सुनता नही बल्कि सुनने की शक्ति देता है
ईश्वर बोलता नहीं है लेकिन जन्म के बाद बिना किसी गुरुकुल में गए बोलने की शक्ति देता है बोलना सीखता है 
इस संसार में कोई भी वस्तु बिना बनाये नही बनती अतः संसार भी किसी ने अवश्य बनाया है
जिसने इस सुंदर प्रकृति की रचना किया है 
वही तो ईश्वर है !!
इस संसार में हम तुक्ष्य मनुष्य पड़े पौधे नही उगा सकते
किसी को सांसे नही दे सकते इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हम सबने कोरोना महामारी में देख और महसूस किया  
हम हमारे जैसे मनुष्य नहीं बना कर सकते न ही पुरुष के शरीर से महिलाओं की तरह प्रजनन की क्षमता उत्पन्न कर सकते है 
दूध तो गाय भैंस बकरी ऊट सब देते है लेकिन सभी की पौष्टिक क्षमता अलग अलग होता है क्यों कैसे कभी सोचा दूध का रंग तो लगभग समान सफेद ही होता है फिर स्वाद और तत्व सब में अगल अलग क्यों और कैसे 
कोई विज्ञान नहीं है इसमें 
विज्ञान से हमे केवल वही पता चल पा रहा है जो पहले से ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने रचना कर रखा है या जो उनकी इच्छा है और जब उनकी इच्छा है तभी विज्ञान कुछ खोज पता है अन्यथा वर्षो लग जाता है एक छोटी चीज भी खोजने में 
यही ईश्वर है मित्रों
इस लिए अपने आप को सनातन धर्म संस्कृति से जोड़े 
भगवान दिखाते नही , न हि दिखाते है वो तो केवल भाव देखते है भावना और प्रेम श्रद्धा व विश्वास को देखते है
स्वयं को भागवत भजन में लगाए जीवन सरल लगने लगेगा शांति मिलेगी लालच माया मोह से विशोभ होने लगेगा 
आप ईश्वर के नजदीक होने लगेंगे यही जीवन का मूल उद्देश्य है।।

जय श्री राम जय श्री सनातन धर्म।।


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Wednesday, 15 June 2022

युवा भारत के भविष्य को संवारने के लिए अग्निपथ के अग्निवीर योजना

अपने बच्चों को IAS, IPS, PCS, Bank Manager बाद में बनाइयेगा पहले उन्हे सशक्त संवेदनशील जुझारू व्व्यक्ति बनाए जिसके लिए भारत सरकार द्वारा आयोजित अग्निपथ के अग्निवीर नियुक्ति प्रक्रिया मे युवाओ की भागीदारी सुनिश्चित कराए।

कल रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह ने देश के तीनो सेनाओं के अध्यक्षों के साथ भारतीय सेना मे भर्ती के लिए #AgnipathKeAgniveer योजना की घोषणा किया है जिसके अंतर्गत साढ़े 17 वर्ष से लेकर 21 वर्ष तक के युवक युवतियों को सेना के तीनो अंग थलसेना, वायुसेना और नौसेना में 4 वर्ष के लिए भर्ती की जाएगी, जिन्हे #Agniveer के नाम दिया गया है। 

इस भर्ती प्रक्रिया के प्रथम चरण में आगामी 90 दिनों में, 40000 युवा व युवतियों को चुना जाएगा जिसके लिए शैक्षणिक योग्यता किसी भी विषय से केवल 10वी व 12वी पास रखा गया है । सभी चयनित अभ्यर्थियों को प्रथम वर्ष में 30000, द्वितीय वर्ष में 33000 तृतीय वर्ष में 36000 और चतुर्थ वर्ष में 40000 रुपए मासिक वेतन व अन्य भत्ता मिलेंगे। जिसमें से पूरे चार वर्ष मे 5.02 लाख फंड के रूप मे कटेगा और 4 वर्ष बाद जब इनको सेवा मुक्त किया जायेगा तब उन्हे कुल 10.04 लाख + 8% चक्रविधि व्याज जोड कर मिलेंगे क्योंकि कटे फंड के बराबर का योगदान भारत की सरकार भी उसे देगी जो लगभग 15 लाख के बराबर होगा। भारतीय सैन्य विभाग इन चुने हुए अभ्यर्थीयो मे से ही 25% लोगो को  सीधे भर्ती के माध्यम से चार साल के Performance के आधार पर Permanent नियुक्ति देगा बाकि शेष बचे लोग जब 4 वर्ष बाद भारतीय सेना छोड़ेंगे तब उनके पास योग्यता अनुसार शैक्षिक शिक्षा का सर्टिफिकेट तो मिलेगा ही जो सभी जगह मान्य होगा, साथ में जिस हुनर में वे प्रशिक्षित होंगे या अपनाया होगा उसका स्किल डेवलपमेंट का प्रमाणपत्र भी मिलेगा। भारत सरकार इतना करने के साथ ही उन्हें स्वयं का उद्यम शुरू करने के लिए बैंक से ऋण देने की संतुति देगी और उनके पास अपना खुद का 15-20 लाख बचत पूँजी होगी जिसके सहयोग से एक अच्छे नागरिक के रूप मे जीवन यापन कर सकेंगे और संभवतः कुछ लोगो को रोजगार भी उपलब्ध करा पायेंगे, साथ मे समाज मे गुमराह युवा पीढ़ी को प्रशिक्षण भी दे सकेंगे जो अच्छे सामाजिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान होगा।

मैं समझता हूँ यह घोषित योजना देश व समाज के लिए आने वाले वर्षो मे अभूतपूर्व सामाजिक बदलाव लाएगी व विकास परक सिद्ध होगी । यदि प्रत्यक्ष लाभों को देखे तो 10वी, 12वी या फिर भेड़िया धसान की तरह नकल के सहारे डिग्री पाए लोगो के लिए अपने स्किलों को पहचानने और उसमे भारतीय सेना के अनुरूप अनुशासन सीखने का यह स्वर्णिम अवसर है। जो भटके हुए युवाओ को एक तरफ आत्मविश्वास व स्वाभिमान देगा एवं स्वालम्बी बनाएगा वहीं जब ये युवा सेवामुक्त होगे तो कम ही उम्र में स्वतः लोगो को रोजगार देने वाला उद्यमी बनने का सुअवसर भी प्रदान करेगा।

अब इससे हट कर एक गंभीर विचार की तरफ बढ़ते है। इस योजना के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण भारतीय सेना में बढ़ते हुए पेंशन व सेना के स्थायित्व को बनाए रखने में बढ़ रहे खर्चों के दबाव को कम करने का भी है, लेकिन यह भारत सरकार की केवल एक समस्या के लिए निकला गया हल नहीं है बल्कि मोदी सरकार द्वारा आने वाले भविष्य की मजबूत सैन्य तैयारी का भी संकेत है। मेरा मानना है की भारत को क्षितिज पर आसन्न संकट के बादल दिखने लगे है। भारत एक लंबे अंतराल तक चलने वाले, भविष्य के एक बड़े महायुद्ध की पूर्व तैयारी कर रहा है। जो युद्ध सिर्फ भारत की सीमाओं या बाहर ही नहीं होगा बल्कि आंतरिक भी होने की संभावनाए है।

भारत इसीलिए कम समय में, भारतीय युवाओं की एक शृंखला तैयार कर रही है जो भारतीय सेना की छत्रछाया में अनुशासन व उद्यम में प्रशिक्षित होंगे। वे 75% युवा,  युवती जो सेना में समायोजित न हो कर भारतीय समाज में जायेंगे, वे आपातकालीन स्थिति में भारत के लिए एक प्रशिक्षित व रक्षित बल के रूप में उपलब्ध होंगे जो भारत को एक लंबे उथलपथल के काल में या फिर खिंचते हुए युद्ध की परिस्थित मे सरकार को अक्समिक भर्तियों के दोराहे पर नही खड़ा होना होगा क्योंकि उसके पास स्वयं में एक प्रशिक्षित वा अनुशासित मानव संसाधन उपलब्ध होगा। 

मैं समझता हूँ की भारत की जनता को आने वाले समय मे एक लंबे संघर्ष के लिए स्वयं को मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए क्योकि आने वाला समय विध्वंस से पुनर्निर्माण और स्थापित मूल्यों व व्यवस्थाओं के बदलाव का होगा। मेरा दृढ़ विश्वास है की इसमें भारत सफलतापूर्वक अवश्य निकल जायेगा लेकिन इसके लिए हमे मन, तन व धन तीनो ही स्पतर पर सरकार का सहयोग के लिए तैयार रहना चाहिए।

इसलिए मेरा देश के सभी प्रबुद्ध नागरिको मित्रो व महिलाओ से निवेदन है कि इस योजना मे स्वयं अपने परिवार के बच्चो को लाभ लेने लिए तो प्रोत्साहित करे ही साथ मे मित्रो रिश्तेदारो व आसपास के लोगो के बच्चो को भी इस भर्ती प्रक्रिया मे भाग लेने के लिए बोले।

आभार धन्यवाद 🙏🏻
जय हिंद, जय भारत।।

 #RatneshMishra #GlobalYouthAwardee2016

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Friday, 17 December 2021

विवाह एक संस्कार है जो पारिवार सामाज व परम्पराओ के अनुसार सम्पादित होता है ना कि कानून के मुताबिक।

देश के उच्च सदन मे महिलाओ के विवाह के संदर्भ मे शादी के लिए उम्र सीमा को निर्धारित करने का कानून पास हुआ जिसके अनुसार अब लडकियो की शादियाँ  21 वर्ष से पहले कानूनन अवैध मानी जाएगी। मेरे समझ से आज के समय मे ऐसे कानून का कोई औचित्य ही नही है क्योकि शादी विवाह एक व्यक्तिगत, पारिवारिक व विशेषकर सामाजिक विषय है जो कि परिवार की सामाजिक आर्थिक व परम्परागत व्यवस्थाओ पर निर्भर करता है। इसके भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विवाह जैसी सामाजिक परंपरा का प्रावधान मनुष्य जीवन मे होने वाली शारिरीक विकास व प्राकृतिक आवश्यकता के अनुरूप किया गया है जो कि सनातन धर्म का एक प्रमुख संस्कार भी है और भारत जैसा देश, जो विश्व मे सबसे अधिक विभिन्नताओ भाषाओ व सांस्कृतिक परम्पराओ से भरा देश है जहाँ हर दस किलोमीटर पर बोली भाषा, बात व्यवहार बदल जाता जहाँ वैवाहिक रिश्ते दादा - दादी, बुआ- फूफा व अन्य सगे - संबंधियो, गुरुजनो के आशीर्वाद, ग्रह नक्षत्रो, कुटुंब के रीति-रिवाजो, परम्पराओ और भावनाओ से तय होता है वहाँ पर उम्र सीमा का बंधन सामाजिक संबंधो मे कवल असहजता ही उत्पन्न करेगा न कि कोई सुगमता होगी लोगो को इससे।

मेरा मानना है कि जब पहले से ही महिलाओ के लिए 18 वर्ष व पुरुषो के लिए 21 वर्ष की सीमा विवाह के लिए निर्धारित है और आजकल तो लडकियो की शादियाँ चाहे गरीब हो या अमीर सबके घर, समाज मे सामान्यतः देर से ही हो रही तो ऐसे मे समाज को कानून के बंधन मे बाधने की कोई आवश्यकता नही है ऐसे कानून का लोगो लाभ तो कुछ नही होगा बल्कि दुष्प्रभाव यह होगा कि समाज के दुष्टप्रवृत्ति के लोग समाज मे कई अन्य तरह की समस्याए पैदा करेगे इससे सभ्य व कमजोर लोगो के लिए जीवन मे असहजता ही उत्पन्न होगा। निस्संदेह आज भी समाज मे 5-10% ऐसे परिवार है जो अपनी लड़की की शादी 18-20 साल से कम उम्र मे कर रहे है लेकिन इसके पीछे उनकी अपनी परिवारिक सामाजिक व आर्थिक मजबूरियाँ भी है अन्यथा आज तो लगभग हर परिवार मे चाहे वो अमीर है या गरीब लड़की की शादी 22-23 साल मे और लड़के की शादी 25-27 साल मे ही हो रहा है तो ऐसे मे जिस उद्देश्य से कानून बनाया गया है वो अपने आप पुरा हो रहा है। रही बात लडकिया के परिपक्वता की तो उन्हे ईश्वर व प्रकृति का ऐसा वरदान है कि वे लडको से कम ऊम्र मे ज्यादा समझदार व परिपक्व हो जाती है बाकि वास्तविक परिपक्वता तो मनुष्य जीवन मे अनुभव व समय से ही आती है इसके लिए किसी कानून की आवश्यक नही है।। 

वैसे अत्यधिक कानून से समाज मे असंतुष्टि व विषमताए ही पैदा होती है लोग अपनी स्वतन्त्रता को बाधित होने पर उसे तोडने का प्रयास करते है जिससे कानून व्यवस्थाओ पर असर पडता है। इसलिए मेरा मानना है कि सरकार को इस कानून को लागू करने से पहले एक बार जरूर सोचना चाहिए। ।

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हम सनातनी है हिन्दु तो हमे बनाया गया है

अक्सर हम लोगो को हिन्दुधर्म के अस्तित्व को लेकर चर्चा करते सुना व बहस करते देखा, खास तौर पर विपक्षी राजनीतिक पार्टी के नेताओ व समर्थको के द्वारा, कुछ लोग कहते है कि हिन्दु कोई धर्म ही नही है जो लोग ऐसा कहते मै ऐसे लोगो को हृदय से धन्यवाद देता हूँ कम से कम इसी वजह से सनातन धर्म पर लोग चर्चा तो शुरु किए और जो ऐसा कहते है वो बिल्कुल सही बोल रहे है हिन्दुधर्म तो केवल एक जीवन शैली है और अपने मूल सनातन धर्म का एक परिष्कृत रूप है जो पूरे भारतवर्ष ( हिन्द महासागर ) के परिक्षेत्र मे फैला था ना कि केवल भारत या हिन्दुस्तान की सीमा तक ही सीमित था बल्कि लगभग पुरे एशियाई परिक्षेत्र तक सनातन धर्म वृहदता लिए हुए था जिसे विदेशी आक्रान्ताओ ने नया नाम हिन्दुधर्म दे दिया जिससे की सनातन धर्म का अस्तित्व और वास्तविक पहचान धीरे धीरे समाप्त हो जाए  और संभवतः यह नाम इस परिक्षेत्र मे रहने वाले लोगो के जीवन शैली के आधार पर तय हुआ होगा लेकिन जो जीवन शैली इस परिक्षेत्र के लोगो का है वह पूर्णतः सनातन धर्म यानि वैदिक ज्ञान पर आधारित है जो एक प्रकार से प्राकृतिक वैज्ञानिक जीवन पद्धति है।
मुझे लगता है सनातन धर्म को हिन्दुधर्म का नाम मुगल शासन के दौरान एक राजनीतिक कुचक्र के तहत प्रचारित प्रसारित किया गया और जैसे जैसे मुस्लिम आक्रंताओ ने हिन्द महासागर के परिक्षेत्र पर अपना कब्जा कर सनातन धर्म मानने वालो की संख्या कम करते गए वैसे वैसे सनातन धर्म मानने वाले लोग एक निश्चित सीमा मे ही सीमित हो गये तब यह धर्म केवल हिन्दुधर्म बनकर रह गया जो कि वास्तविक सनातन धर्म का ही एक जीवन शैली है।

वैसे भी मुगलो का यह उद्देश्य ही था कि सनातन धर्म को समाप्त कर दिया जाए जिसे उन्होने हिन्दुधर्म का नाम देकर बहुत हद तक सफलता भी हासिल कर लिया था और जो बचा रहा उसे काग्रेस पार्टी के लोगो ने समाप्त करने की कोशिश किया क्योंकि मुगलो को सनातन धर्म व संस्कृति की श्रेष्ठता एवं वैज्ञानिक महत्ता अपाच्चय था जबकि सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो आदिकाल से मनुष्य जीवन क लिए ज्ञान व संस्कार का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है बाकि सब तो बस एक सम्प्रदाय है एक विचार धारा है एक जीवन शैली है इससे अधिक और कुछ भी नही। यह हम भारतीयो का दुर्भाग्य है कि जो गलतफहमी मुगल व ब्रिटिश फैला गए उसी को सभी विपक्षी पार्टी आज सह दे रही है उसी पर राजनीति कर रही है और हम है कि उनके खेल का हिस्सा बनकर हो हल्ला कर रहे है आनंद ले रहे है और हमारा मूल धर्म- सनातन धर्म विलुप्त हो रहा है जिसे अब एक बार फिर से जिंदा करने का प्रयास किया जा रहा है तो कुछ समुह के लोग धर्म की राजनीति का नाम दे रहे है। 
मेरा अनुरोध है सभी सनातनियो से अब तो जागिये नही तो हमारी आने वाली पीढ़ी अपने मूल धर्म को जान ही नही पाएगी और सब लोग अपने को हिन्दु की जगह सनातनी कहना शुरू करिए क्योंकि हम सब सनातनी है हिन्दु तो हमे बनाया गया है । सरकार से मांग करिए की सरकारी कार्यो व पहचान पत्रो मे प्रत्येक जगह धर्म के कालम मे हिन्दुधर्म हटाकर सनातन धर्म करे इसके लिए यदि बड़ा आन्दोलन करने की जरूरत हो तो उसके लिए माहौल तैयार करिए जातिवाद क्षेत्रवाद से ऊपर उठिए सबको इकठ्ठा करिए जिससे हम सनातनी अपनी वास्तविक पहचान को विश्व से परिचित करवाए जिससे वर्तमान व आने वाली पीढ़ी ये गर्व से कह सके की हम सनातनी है ।।
जय हो सत्य सनातन धर्म की ।। 

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Monday, 23 November 2020

कर्म फल का एक अद्भुत उदाहरण महाभारत के एक मुख्य पात्र धृतराष्ट्र से मिलता है

महाभारत युद्ध के मुख्य कारणों में से एक कारण धृतराष्ट्र स्वयं थे उनका राज्य के प्रति अत्यधिक मोह व लोभ और अपने पुत्रो की अपेक्षा पांडव पुत्रों का अधिक संस्कारी, सदाचारी व गुणवान होने का प्रभाव उन्हे अंदर से राजपाठ छूटने का भय पैदा करता था जिससे पांडवो के प्रति उनके अदंर ईर्ष्या का भाव बन गया था जो धृतराष्ट्र को व्यवहारिक रूप से अंधा बना दिया था और वे एक राजा का वास्तविक धर्म निभाने मे असफल रहे यह सब कुछ कही न कही उनके पूर्व जन्म के कर्मफल प्रारब्ध के प्रभाव के कारण हो रहा था लेकिन यदि वे चाहते तो अपने वर्तमान जन्म के कर्म, बुद्धि, विवेक, त्याग व सदाचार से उस प्रभाव को सुधार सकते थे परन्तु उनका स्व मन पर दृढ़ संयम न होने से उनका प्रारब्ध उन पर भारी पड़ा और कुरुक्षेत्र के मैदान में उनको अपने सौ पुत्रों का बलिदान देना पड़ा। 
 
धृतराष्ट्र जन्मांध क्यों थे ? इसके बारे में शायद ही कुछ लोगों को पता हो लेकिन पुराणों में उनके पूर्व जन्म की एक कथा का उल्लेख है जिसके अनुसार पूर्व जन्म में एक बार उन्होंने बिना देखे ही जंगल की झाड़ियों में आग लगा दिया था जहाँ एक सर्प, नागिन के १०० अंडेों की देखरेख कर रहा था, जो उसके बच्चो को जन्म देने ही वाली थी किन्तु उसी समय आग लग गई। जब नागिन ने अपनी आँखों के सामने अपनी संतानों की हत्या देखी, तो अत्यंत क्रोधित हो राजा को श्राप दे दिया कि "जिस प्रकार मेरी आँखों के सामने तूने मेरे १०० पुत्रो की हत्या की है, जिनका मुख भी मैं नहीं देख सकी... उसी प्रकार तेरे १०० पुत्र तेरी आँखों के सामने ही मारे जायेंगे और तू उनके मुख कभी नहीं देख सकेगा।
प्रारब्ध का खेल देखिए कि सर्प-श्राप के कारण कर्मफल फलित करने के लिए ईश्वर ने ऐसी रचना रची की धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे पैदा हुए और द्रौपदी जिनका एक दुसरा नाम याग्निक था  क्यो कि उनका जन्म अग्नि वेदी से हुआ था यानि द्रौपदी अग्नि पुत्री थी जो कि महाभारत युद्ध की दुसरी मुख्य पात्र थी जिन्होंने धृतराष्ट्र के लाड़ले पुत्र पर ऐसा व्यंग बाण छोड़ा कि दुर्योधन ने अपने विवेकहीनता की सारी पराकाष्ठा पार कर अपने कुल का ही सर्वनाशक बन गया। यहाँ एक बात समझिये कि पूर्व जन्म में नागिन के पुत्रों के मृत्यु का कारण अग्नि था तो  धृतराष्ट्र के पुत्रों के मृत्यु का कारण भी अग्नि पुत्री द्रौपदी ही बनी और धृतराष्ट के १०० पुत्र उनकी आँखों के सामने कुरुक्षेत्र के महायुद्ध में मारे गये और राजा अपने पुत्रो का मुख कभी नहीं देख सके, विधि का विधान देखिये महाभारत युद्ध के पश्चात् जब धृतराष्ट्र को अपनी गलतियों का एहसास हुआ तो कुछ समय बाद उन्होंने अपने बुरे कर्मो का पश्चाताप करने के लिए अपने कुल गुरू वेद व्यास के आश्रम में जाकर तपस्या करने की इच्छा युधिष्ठिर से व्यक्त किया तब गांधारी व कुंती भी उनके साथ महल छोड़ जंगल में व्यास जी के आश्रम में प्रवास करने लगे। कुछ समय पश्चात एक दिन तीनों ध्यान साधना में लीन थे कि अचानक जंगल में आग लग गयी और तीनों की जीवन लीला आग की तेज लपटों ने समाप्त कर दिया।
कर्मो के बंधनों से मुक्ति असंभव है इसलिए कभी भी किसी की आत्मा को केवल अपने निजी स्वार्थ के लिए दुःखी पीड़ित न होने दे क्यो कि किसी कमजोर असहाय की अंतरआत्मा की पीड़ा से निकला श्राप निश्चित रूप से फलित होता है। इसका एक और उदाहरण महाभारत कथा से मिलता है युद्ध समाप्ति के पश्चात भगवान श्री कृष्ण पांडवो को लेकर जब धृतराष्ट्र व गांधारी के पास गये तब दोनों अपने सौ पुत्रों के मृत्यु की वजह से बहुत दुःखी थे वार्ता के दौरान पुत्र मोह में दुःखी गांधारी ने श्री कृष्ण को श्राप दे दिया कि वासुदेव तुम तो भगवान हो तुम तो सब कुछ जानते थे तो क्यो युद्ध को रोका नहीं तुम भी मेरे पुत्रों के मृत्यु के कारण हो और तुम्हारा परिवार व राजपाठ भी इसी प्रकार नष्ट हो जायेगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही भगवान श्री कृष्ण की द्वारिका भी हस्तिनापुर की तरह नष्ट हुईं और श्री कृष्ण की मृत्यु भी बहुत पीड़ादायी थी। 
जय श्री कृष्ण। ।
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Sunday, 22 November 2020

मौन मानव जीवन के लिए अध्यात्मिक ज्ञान व चिंतन का एक महत्वपूर्ण माध्यम है जिससे जीवन की बहुत समस्याओं का समाधान संभव है।

मौन का अर्थ है वाणी की पूर्ण शान्ति यह वह शक्ति है जो आत्मा को परमात्मा से जोडने में सार्थक सिद्ध होती है। जीवन मे मौन का मतलब केवल चुप रहना नहीं है यह एक गहरी साधना का माध्यम है जिससे मनुष्य अपने अंतरआत्मा की धुंधली परतों को हटाकर अपने वास्तविक स्व रूप का परिचय प्राप्त करता है। मौन मनुष्य के भीतर के सौन्दर्य और गहराई को निहारने की एक अनूठी प्रक्रिया है। लेकिन जीवन मे मौन तभी संभव है जब व्यक्ति अपने आपको सांसारिक गतिविधियों से स्वयं को थोड़ा दुर कर अपने वाणी को विराम दे क्यो कि जब व्यक्ति अपनी  वाणी को संयमित करने का अभ्यास करना शुरू करता है तो वाणी धीरे-धीरे अपने आप विराम अवस्था को प्राप्त होने लगती  है तब व्यक्ति आहिस्ता -अहिस्ता अपने अंतरआत्मा के समीप पहुँचने लगता हैं और अपनी वास्तविक पहचान प्राप्त करने मे सक्षम होने लगता हैं क्यो कि मौन में वह शक्ति है जो प्राणों की ऊर्जा के अपव्यय का समापन करती है जिसे अक्सर मनुष्य अनर्गल बोलकर शब्दों के माध्यम से ह्रास करता रहता है। जो मौन धारण करके एकत्रित किया जा सकता है।

यदि लोग जीवन मे थोड़ा मौन धारण करने का प्रयास करे तो  मौन से संसारिक जीवन की नब्बे प्रतिशत समस्याएं कम होने  की संभावनाएं है लेकिन होता यह है कि मनुष अपने भीतर बैठे हर मनोविकार को वाणी के द्वारा बाहर प्रवाहित करता रहता है  जिससे उसके आस पास के नकारात्मक परिवेश का सृजन होता है। इसलिए व्यक्ति को विषम परिस्थितियों में बोलते समय हमेशा सतर्क रहना चाहिए क्यो कि विषम परिस्थिति में जिह्वा जो भाषा उत्पन्न कर सकती है वैसा तलवार के माध्यम से भी होना कठिन है। जिह्वा द्वारा दिया गया घाव कभी नहीं भरता इसलिए हमें हमेशा सकारात्मक सोच व विचार का प्रवाह रखना चाहिए और क्रोध कि स्थिति में हमेशा मौन रहे।  

आध्यत्मिक स्तर पर भी जीवन में ऊँचाइयों को छूने के लिए मौन का सहारा अवश्य लेना पड़ता है इसके लिए महावीर स्वामी ने भी बारह वर्ष तक मौन रखा और गौतम बुद्ध ने भी छ:वर्ष तक, जिसके पश्चात उनकी वाणी दिव्य हो गई। सांसारिक जीवन में साधारण मनुष्य के मन में हर पल विचारों का मेला लगा रहता है, हर क्षण उसके मन में एक नये विचार का उदय होता है। ऐसी स्थिति में मौन का पूरा लाभ तभी लिया जा सकता जब व्यक्ति बाहर के साथ-साथ अन्दर से मौन सुनिश्चित कर पाये और अंदर से मौन सुनिश्चित करने के लिए व्यक्ति को विचारों को भी संयमित करना होगा जो केवल ध्यान साधना से ही संभव है वैसे भी मौन और ध्यान दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। इसके लिये व्यक्ति को संसारिक कौतूहल व लोगों के भीड से दूर प्रकृति के बीच में जाकर प्रयास करना चाहिए क्योंकि प्रकृति  हर समय संसार को एक नया सन्देश देती है उसके कण कण में एक दिव्य संगीत की धुन सुनाई देती है जिससे व्यक्ति भीतर से धीरे धीरे शान्त होते जाता है और प्रकृति के हर शब्द को अपने भीतर अनुभव करने लगता हैँ। भ्रमरों के गुंजार की अनन्त ध्वनि व्यक्ति को सुनाई देने लगती है डालों पर बैठे पक्षियों के चहचहाने जैसे भैरवी स्वरों का आभास व्यक्ति को होने लगता है। इस प्रकार मनुष्य जीवन मे आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को प्रकृति को समझना होगा जो कि अपने भीतर के मौन को जाग्रत करने से ही संभव है। 

मौन वास्तव में मनुष्य जीवन की वह संजीवनी शक्ति है जिससे व्यक्ति के प्राणों की ऊर्जा का पुन:विकास एवं उत्थान होता है। जीवन मे नित्यप्रति तीन या चार घंटे का मौन रखना लाभदायक होता है। मौन के निरन्तर अभ्यास से व्यक्ति की वाणी पवित्र होने लगती है और उसमें सत्यता जाग्रत होती है। ऐसा व्यक्ति वाणी से जो भी बोलता है वह सच होने लगता है। उसके व्यक्तित्व में गंभीरता आने लगती है और मन एकाग्रता की ओर बढ़ता है।  
मौन जब पूर्ण रूप से सिद्ध होकर लयबद्ध हो जाता है तब ऐसा महसूस होता है जैसे जीवन मे कोई विचार ही नहीं है और मन आत्मा में विलीन हो एक शान्त सागर जैसा प्रतीत होता है जहाँ  कोई लहरे नहीं उठती तब व्यक्ति एक रस में बहता चला जाता है। मौन में लहरों की भांति उठने वाले विचार विलीन हो जाते हैं। व्यक्ति को अहसास होता है कि जो 'मै' था वह केवल जड़ की अनुभूति थी। अब मै एक चेतना का सागर हूँ। परिपूर्ण मौन शान्ति के जल में मन की आहूति है।

मौन शान्ति का सन्देश है। यह स्वयं को ईश्वर से जुडने का सबसे सरल उपाय है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यस्त दिनचर्या में से कुछ क्षण निकालकर संकल्पबद्ध होकर प्रतिदिन मौन साधना में उतरकर परम शान्ति का अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए। यह मनुष्य जीवन के लिए एक श्रेष्ठ तप है जो हमारे ऋषि-मुनियों की अमूल्य धरोहर है। 
                           

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घर में बहू चुनते समय संस्कार को वरीयता दे ना कि दहेज़

एक ऐसा सच जिसे बहुत कम लोग ही आज तक समझ पाये है कि - बुढापे की लाठी-"बहु" होती है न कि "बेटा"
हम लोगों से अक्सर सुनते आये हैं कि बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है। इसलिये लोग अपने जीवन मे एक "बेटा" की कामना ज़रूर रखते हैं ताकि बुढ़ापा अच्छे से कट जाए परन्तु ये बात केवल इतना ही सच है कि बेटे ही माध्यम होते है बहु को घर लाने के लिए बुढापे की लाठी तो बहू ही बनती है। बहु के आ जाने के बाद बेटा अपनी लगभग सारी जिम्मेदारी अपनी पत्नी के कंधे में डाल देता है और फिर बहु बन जाती है अपने बूढ़े सास-ससुर की बुढ़ापे की लाठी, जी हाँ ये लगभग सत्य है कि वो बहु ही होती है जिसके सहारे बूढ़े सास-ससुर या माॅ-बाप अपना जीवन व्यतीत करते हैं।एक बहु को अपने सास-ससुर की पूरी दिनचर्या मालूम होती कि वे कब और कैसी चाय पीते है, उनके लिए क्या खाना बनाना है, शाम में उन्हे नाश्ता क्या देना है, रात को हर हालत में 9 बजे से पहले खाना बनाना है ये बहु को ही पता होता है न कि बेटे को। अगर सास-ससुर बीमार पड़ जाए तो अक्सर पूरे मन या बेमन से कहे बहु ही देखभाल करती है, अगर एक दिन के लिये बहु बीमार पड़ जाए या फिर कही चली जाएं, बेचारे सास-ससुर को ऐसा लगता है जैसा उनकी लाठी ही किसी ने छीन ली हो। वे चाय नाश्ता से लेकर खाना के लिये छटपटा जाएंगे उन्हे कोई पूछेगा नही, उनका अपना बेटा भी नही क्योंकि बेटे को फुर्सत नही है और अगर बेटे को फुरसत मिल भी जाये तो वो कुछ नही कर पायेगा क्योंकि उसे ये मालूम ही नही है कि माँ-बाबूजी को सुबह से रात तक क्या क्या देना है क्योंकि बेटो के तो केवल कुछ निश्चित सवाल है जैसे कि माँ-बाबूजी खाना खाएं,चाय नाश्ता किये या बीमार होने पर हास्पीटल तक छोड़ने तक ही वे अपनी जिम्मेदारी समझते है या ये कहे कि इससे ज्यादा उनके पास समय ही नही है लेकिन कभी भी ये जानने की कोशिश नही करते कि वे क्या खाते हैं कैसी चाय पीते हैं और ऐसा तभी संभव है जब वे उनके पास बैठे बाते करे लेकिन दुर्भाग्य से हमारे समाज मे माता पिता भी अपने बच्चों के साथ कभी इतना समय नही दिये होते है कि बच्चे उनके पास बैठकर कुछ समय व्यतीत करे या बात चीत करे जिससे उन्हे अपने बूढ़े माता पिता की दिनचर्या पता रहे ऐसा इसलिए भी है कि बहुत से माता पिता अपने बच्चों से खुलना पसंद नहीं करते है  लगभग हर घर की यही कहानी है। हम सब अपने आस-पास अक्सर देखते सुनते होंगे कि बहुएं या बेटियां ही अंत समय मे अपनी सास ससुर की बीमारी में तन मन से सेवा करती थी बिल्कुल एक बच्चे की तरह, जैसे बच्चे सारे काम बिस्तर पर करते हैं ठीक उसी तरह उसकी सास भी करती थी और बेचारी बहु उसको साफ करती थी, बेटा तो बचकर निकल जाता था किसी न किसी बहाने। ऐसे बहुत से बहुओ के उदाहरण हम सबको मिल जायेंगे। मैंने अपनी माँ व चाची को दादी की ऐसे ही सेवा करते देखा है वो बोलेंगी गुस्सा भी करेगी लेकिन आवश्यकता अनुरूप देखभाल भी करेगी। आपलोग में से ही कईयों ने अपने घर परिवार व समाज में बहुत सी बहुओं को अपनी सास-ससुर की ऐसी सेवा करते देखा होगा या कर रही होगी। कभी -कभी ऐसा होता है कि बेटा संसार छोड़ चला जाता है तब बहु ही होती है जो उसके माँ-बाप की सेवा करती है, ज़रूरत पड़ने पर नौकरी करती है लेकिन अगर बहु दुनिया से चले जाएं तो बेटा फिर एक बहु ले आता है क्योंकि वो नही कर पाता अपने माँ-बाप की सेवा उसे खुद उस बहु नाम की लाठी की ज़रूरत पड़ती है। इसलिये मेरा मानना है कि बहु ही होती ही बुढ़ापे की असली लाठी लेकिन अफसोस "बहु" की त्याग और सेवा उन्हे भी नही दिखती जिसके लिये सारा दिन वो दौड़-भाग करती रहती है। बहु के बाद यदि कोई और सास ससुर की सेवा करता तो वे पोते -पोती ही करते है लेकिन ये तभी संभव है जब बहू संस्कारी हो और सास ससुर ने उन्हें अपने घर लाने के बाद अच्छा सम्मान दिया हो क्यो कि घर का कोई नया सदस्य चाहे वो बहू हो या पोता पोती संस्कार तो अपने बड़ो से ही सीखते है।
इस लिए मेरा एक विनम्र निवेदन है आप सब लोगों से की बहू को #दहेज की तराजू में तौल कर मत लाइये बल्कि संस्कार शिक्षा व व्यवहार के तराजू पर तौल के लाइये क्योंकि बुढापे की लाठी बहू व उसके बच्चे ही बनेंगे न कि बेटा और भ्रूण हत्या का विचार भी मन से निकालिए खुशी मन से बेटियों का आगमन, जीवन मे ईश्वर का आशीर्वाद समझकर करें क्यो कि बेटियों का महत्व केवल बहू के रूप में लाने तक ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक महत्व है इस सृष्टि की संरचना को निरंतर आगे बढ़ाने के लिए।
आप सबसे  प्रार्थना है कि मेरे इस विचार को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं शायद कुछ लोग इस सत्यता को समझ सके और #दहेज रूपी दानव का अपने जीवन परिवार व समाज से बहिष्कार करने मे आगे आए।


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Sunday, 26 April 2020

सनातन धर्म में अक्षय तृतीया को सर्व श्रेष्ठ तिथि क्यो माना जाता है ?

जो कभी क्षय न हो उसे अक्षय कहते हैं वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहते हैं। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं उनका अक्षय फल मिलता है इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। स्कंदपुराण और भविष्य पुराण में यह उल्लेख कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी अक्षय तृतीया की इस तिथि को परम पुण्यमय बताया है। अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है। युगादि का शाब्दिक अर्थ है युग आदि अर्थात एक युग का आरंभ। इस दिन सूर्य पूर्ण बली होते है इसीलिए इस दिन सूर्य प्रधान त्रेता युग का आरंभ हुआ।
अक्षय तृतीया को विशेष तिथि इस लिए भी माना जाता है कि आज के दिन से ही महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना आरंभ की थी और महाभारत के युधिष्ठिर को अक्षय पात्र की प्राप्ति भी इसी दिन हुई थी जिसके बारे में यह किंवदंती प्रचलित है कि उसमें रखा गया भोजन समाप्त नहीं होता था। भगवान शिव ने आज के दिन ही माॅ लक्ष्मी एवं कुबेर को धन का संरक्षक नियुक्त किया था। इसीलिए इस दिन सोना, चांदी और अन्य मूल्यवान वस्तुएं खरीदने का विशेष महत्व है।

पुराणो मे ऐसा उल्लेख है कि आज के दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं और इस दिन गंगा स्नान करने से व भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है और यदि यह तिथि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल अत्यधिक बढ़ जाता हैं। आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं। अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है।

आज के दिन ही ऋषि जमादग्नि तथा माँ रेणुका के पुत्र भगवान विष्णु के छठें अवतार परशुराम जी का भी अवतार हुआ था जो आज भी अजर अमर है। इनके अलावा छः और लोगों को अमरत्व का वरदान है
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनुमांश्च विभीषण:,कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:।।
भगवान शिव के परम भक्त श्री परशुराम धर्म न्याय व वीरता के साक्षात उदाहरण है परशुराम जी की त्रेता युग के दौरान सीता के स्वयंवर में भगवान राम द्वारा शिवजी का पिनाक धनुष तोड़ने पर क्रोधित होने का उल्लेख मिलता है और दापर युग महाभारत काल मे उन्होंने गंगा पुत्र भीष्म और कर्ण को धनुर्विद्या प्रदान किया।

श्रीबांकेबिहारी जी के चरणों के दर्शन भी केवल अक्षय तृतीया के दिन ही मिलते है। वृंदावन के मंदिरों में ठाकुर जी का शृंगार चंदन से किया जाता है ताकि प्रभु को चंदन से शीतलता प्राप्त हो सके और बाद में इसी चंदन की गोलियां बनाकर भक्तों के बीच प्रसाद रूप में वितरित कर दी जाती हैं। श्री बद्रीनारायण की दर्शन यात्रा का शुभारंभ भी अक्षय तृतीया के दिन से ही होता है जो प्रमुख चार धामों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि नर-नारायण का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान कृष्ण एवं सुदामा का पुनः मिलाप हुआ था।


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Sunday, 12 April 2020

मोदी जी के नेतृत्व में भारत का विश्वगुरु बनने की ओर बड़ता कदम।।

आज जब पुरे विश्व में कोरोना वायरस जैसी एक सूछ्म से परजीवी से लड़ते हुए लोग दम तोड़ रहे है । विश्व के सारे वैज्ञानिको व अनुसंधान केन्द्रो को इसका कोई उपयुक्त इलाज नही समझ आ रहा है, न कोई एटम बम काम आ रहे न पेट्रो रिफाइनारी ? नासा के सारे अंतरिक्षीय खोजो का औचित्य नगण्य हो गया है, सारा भौगोलिक व आर्थिक विकास एक छोटे से जीवाणु का सामना नहीं कर पा रहा ? एक छोटे से जीव ने आज लगभग पूरे विश्व को घरो में कैद कर दिया है। 
मध्य युग में पुरे यूरोप पर राज करने वाला इटली लगभग नष्ट होने के कगार पर पहुंच चुका है यहाँ लगभग 20 हजार से अधिक लोग परलोक पहुंच गए हैं लाखों लोग अस्पताल में जीवन और मौत के बीच की सांसें ले रहे है जिन लोगों ने परिवार के सारे सदस्यो को इस महामारी में खो दिया वे लोग अपने जीवन के कमाया सारे धन को सड़को पर लुटा खुद आत्म हत्या कर रहे है। स्पेन, फांस, बेल्जियम, जर्मनी, डेनमार्क, लगभग पूरे यूरोप में त्राहीमाम मचा है अर्थव्यवस्था लगभग ध्वस्त हो चुकी है। कभी पूरे मध्य पूर्व पर अपना आधिपत्य रखने वाला ओस्मानिया साम्राज्य ( ईरान व टर्की ) को अब कोई युक्ति नही सुझ रही हैं 3500 से अधिक लोगों की जीवन लीला समाप्त कर दिया एक छोटे से जीवाणु ने। ब्रिटिश साम्राज्य जिसका आधिपत्य एक समय विश्व के 56 देशो तक फैला था उसके वारिश आज स्वयं बर्मिंघम पैलेस में कैद होने को मजबूर हैं। रूस जैसे वृहद क्षेत्रफल वाला देश जो स्वयं को आधुनिक युग की सबसे बड़ी शक्ति समझते थे आज अपना सारे बॉर्डर सील कर दिया हैं। अमेरिका जिसके एक इशारे पर दुनिया के नक़्शे बदल जाते हैं जो पूरी दुनिया में अपने को अघोषित चौधरी समझता है यहाँ भी केवल एक महीने में 25 हजार से अधिक लोग दुनिया छोड़ चुके है और 3.5 लाख लोग जीवन की अंतिम सांसे गिन रहे हैं। जो आने वाले समय में पूरे विश्व को अपने कब्जे में करने के सपने संजोये है, वो चीन आज दुनिया के साथ विश्वासघात कर मुँह छिपता फिर रहा है।
आज विश्व के लगभग सौ से अधिक देश लाकडाउन की प्रकिया से गुजर रहे हैं सभी सामाजिक आर्थिक गतिविधिया बंद है। मेनचेस्टर की औध्योगिक क्रांति और हारवर्ड की इकोनॉमिक्स सोच #कोरोना के कहर में पूर्ण रूप से शिथिल हो गयी है। आज पूरी दुनिया आशा भरी नज़रो से देख रहे हैं उस भारत की ओर, जिसका सदियों से यही सारे देश अपमान करते रहे, लूटते रहे है लेकिन अब सबको लग रह है कि वर्तमान आपदा से लड़ने की राह विश्व को भारत ही दिखा सकता है ? आज दुनिया को हाइड्रोक्लोरोफ्लेक्सिन जैसी दवा कोरोना वायरस के बीमारी से बचाने में रामबाण का काम कर रही है उसके लिए पुरा विश्व भारत पर निर्भर है ये दवा पाकर ब्राजील के राष्ट्रपति ने मोदी जी को धन्यवाद प्रेषित करते हुए संजीवनी बूटी की संज्ञा दी। इससे पता चलता है कि अब भारतीय वैदिक सांस्कृतिक जीवन शैली की महत्ता का एहसास पूरे विश्व को हो चुका है जहाँ सांसारिक वैभव को त्यागकर आंतरिक शांति की खोज करने वाले हजारों ॠषि मुनियों ने आयुर्वेद,ध्यान, योग, हवन व यज्ञ जैसे तमाम ऐसे युक्तियो का विकास सदियों पहले कर दिया था जो सुरक्षित स्वस्थ जीवन के लिए महत्वपूर्ण है।
वैसे मुझे लगता है कि कोरोना वायरस जैसी महामारी का अभी केवल आरम्भ हुआ है जैसे जैसे ग्लोवल वार्मिंग बढ़ेगी, ग्लेशियरो की बर्फ पिघलेगी और आज़ाद होंगे लाखो वर्षो से बर्फ की चादर में कैद दानवीय विषाणु, जिनका न हमे परिचय है और न लड़ने की कोई तैयारी। ये कोरोना तो बस चेतावनी है, उस आने वाली विपदा की, जिसे हम मनुष्यो ने जन्म दिया है यह एक ऐसा युद्ध जिसमे हमें हरने की सम्भावना पूरी है यदि हम अब भी पर्यावरण से छेड़छाड़ करना बंद नही किये। वैसे सूछ्म एवं परजीवियों से मनुष्य का युद्ध नया नहीं है, ये तो सृष्टि के आरम्भ से अनवरत चल रहा है और सदैव चलता रहेगा जिससे लड़ने के लिए भारत ने हर हथियार सदियों पहले खोज भी लिया था, मगर अहंकार, लालच व स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की हठ धर्मिता वाली पश्चिमी व यूरोपीय सोच ने सब नष्ट कर दिया लेकिन आज भी भारत अपनी समृद्धिशाली वैदिक संस्कृति व व्यवस्था के उपयोग से विश्व के भीषणतम महामारी से लड़ने व संसार को दिशा देने मे सक्षम है और मार्ग निकलेगा उन्ही नष्ट हुए हवन कुंडो से, जिन्हे कभी पैरों की ठोकर से तोडा गया था, उसी नीम और पीपल की छाँव में उम्मीद की किरणें दिखाई दे रही है, जिसका कभी उपहास किया गया था, उसी गाय की महिमा को स्वीकार करना पड़ेगा, जिसे यही यूरोपीय व पश्चिम देशो ने स्वाद के कारण अपना मुख्य भोजन बना लिया। उन्ही मंदिरो के घंटनाद की परंपरा को अपनाना पड़ेगा जिन मदिंरो को तोडा गया था, उन्ही वेदो मंत्रों को पढ़ना पड़ेगा जिन्हे कभी अट्टहास करते हुए तिरस्कृत किया था, उसी चन्दन तुलसी को मष्तक व गले पर धारण करना पड़ रहा है, जिसके लिए कभी हमारे मष्तक धड़ से अलग किये गए थे।
ये प्रकृति का न्याय है और विश्व को स्वीकारना होगा। युगों युगों से जब भारतीय सनातन धर्म एक दूसरे को हाथ जोड़ कर नमस्ते करने, हाथ पैर धोकर घर मे घुसने व मानवता के उच्चतम आदर्श को मानते हुए जानवरों, पेड़ों और जंगलों की पूजा करने, योग प्रणायाम व शाकाहारी भोजन अपनाने पर जोर दे रहा था, श्मशान और अस्पताल से आकर स्नान करने की परंपरा का पालन करने को कह रहा था तब पूरी दुनिया हंसती थी लेकिन अब? अब कोई नही हंस रहा, बल्कि कोरोना वायरस के प्रभाव में आज पुरा विश्व भारतीय संस्कार को अपना रहा हैं। पुुुरी दुुनिया आज नमस्कार की परंपरा का पालन कर रहा है, अमेरिका जैसा समृृद्धि व शक्तिशाली देश पीपल वृक्ष व तुलसी के पौधे को अच्छे पर्यावरण के लिए सर्वश्रेष्ठ मान रही है चीन दाह संस्कार की व्यवस्था को अपनाने के लिए कह रहा है, मलेशिया के एक वैज्ञानिक ने वहां के राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में लेख लिखकर लोगों से शाकाहारी खानपान को अपनाने की अपील किया, इंग्लैंड, अमेरिका सहित कई यूरोपीय देशों में ससंद मे वैदिक मंत्रोचचारण कराया गया, जापान में महामृत्युंजय मंत्र का सामूहिक जाप आयोजित किया गया। स्पेन के राष्ट्रीय रेडियो चैनल पर प्रतिदिन सुबह वैदिक मंत्रों का प्रसारण करवाया जा रहा है।
आज प्रकृति, भारतीय संस्कृति सभ्यता का मजाक उड़ाने वालो को सीख दे रहा है कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं और कर्म फल भोगना ही पड़ता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को धर्म का उपदेश देते समय कहा कि वत्स पुरा ब्रहमांड मेरे मे ही समाहित है सब कुछ मै ही हूँ और संसार में घटित होने वाली सभी घटनाएं मेरे इच्छा के अनुरूप ही होती है फिर भी मेरा वस तो केवल कर्मफल तक ही निहित है मनुष्य तो सुख दुःख अपने कर्मो के फलस्वरूप भोगता है। भगवद्गीता में उल्लेखित यह सम्वाद आज रूस जैसे बड़े ताकतवर देश में प्राइमरी स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल है। सच ही कहा गया है सनातन धर्म केवल एक धम॔ ही नहीं अपितु एक जीवन पद्धति है इसको दैनिक जीवन में अपनाने वालों को सामान्य विषाणु प्रभावित नहीं कर पाते हैं। 
दुनिया को ये मानना ही होगा कि अगर वास्तव मे समृद्धिशाली जीवन जीना है, तो ॠगवेद यजुर्वेद अथर्वेद व सामवेद, उपनिषद, भागवगीता, रामायण का गहन अध्ययन करना ही होगा, तक्षशिला नालंद की मिट्टी से क्षमा याचना करनी ही होगी और
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत् ।। की उच्चकोटि की सोच व भारतीय व्यवस्था को अपनाना ही होगा।।


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Tuesday, 24 March 2020

जब भारतीय परिवारों की हजारों साल पुरानी शंख व घंट ध्वनि की दैनिक परंपरा जीवंत हो गयी

भारत देवताओं व ॠषि-मुनियों की भूमि है जहाँ वैदिक मंत्रोंच्चारण व यज्ञो के माध्यम से असंभव कार्यों व बीमारीयो का समाधान किया जाता रहा है, यहाँ शंख व घंट ध्वनि की परंपरा दैनिक जीवन में प्रातः व सांध्य वंदन के समय युगों पुरानी है जिसे राक्षसी प्रवृत्ति के विदेशी आक्रमणकारियों ने हजारो बार आक्रमण कर वैदिक साहित्य व संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने का प्रयास किया लेकिन भारतीय ब्रम्हषियो की संतानों में वैदिक संस्कृति इस तरह समाहित है कि वे जड़ से समाप्त नहीं कर पाये। यही कारण है कि आज भी हम बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान वैदिक मंत्रों ऋषि मुनियों व पूर्वजों की कृपा से ढूंढ लेते है आज जब पुरा विश्व कोरोना वायरस जैसी महामारी से प्रभावित है ऐसे में एक बार फिर से हजारों साल पुरानी शंख व घंट ध्वनि परंपरा का सहारा लेकर विषाणुओं को हवा में ही नष्ट करने का सफल प्रयास हम सबने मिलकर किया है।
हाल में ही आयोजित ऐतिहासिक जनता कर्फ्यू  का लगभग 100% सफल होना यह सिद्ध करता है कि भारतीय संस्कृति की जड़ें इतनी मजबूत है कि भारतवासी मानवता व वैदिक परंपरा की रक्षा के लिए कभी भी एक आवाज पर संगठित हो सकते है सिर्फ आवाज देने वाले का उद्देश्य सही होना चाहिए। लोग इसको अलग-अलग तरह से परिभाषित कर रहे हैं कुछ लोगो का कहना है कि, ये जनता का सुरक्षित जीवन के प्रति डर या भारतीय सामाज की सवेंदनशील सोच या शायद देश प्रेम की वजह से संभव हुआ, लोग चाहे जो भी कहे लेकिन जिस तरह से रविवार 22 माच॔ की शाम को ठीक 5 बजे देश के हर गाँव, शहर, गली-मोहल्ले, में अमीर से अमीर जैसे देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी से लेकर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन तक व गरीब से गरीब परिवार के प्रत्येक व्यक्तियों का एक साथ खड़े होकर शंखनाद नाद करना, तालियों की गडगडाहट व घंटो की आवाज, महिलाओं बुजुर्गों व बच्चों की उत्साहित भागीदारी ने ये सिद्ध कर दिया कि भारतीयों का युगों पुरानी वैदिक व्यवस्था पर आज भी अटूट विश्वास है। जिस का नजारा आजादी के बाद पहली बार देखने को मिला, जब देश का हर घर मंदिर प्रतीत हो रहा था। जो भारतीय संस्कृति सभ्यता को जीवंत बनाए रखने का मोदी जी का एक अद्भुत प्रयोग और अगली पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का एक बड़ा सदेंश भी था।
कोरोना महामारी के वजह से ही सही लेकिन देश की जनता ने पूरे विश्व को भारत की संस्कृति, संवेदनशीलता व जिम्मेदारी के भाव, लोकतांत्रिक सोच और राष्ट्र के प्रति नागरिक सम्मान के भाव का जो सदेंश जनता कर्फ्यू को सफल बनाकर दिया है ये अतुलनीय है। यह विजय नाद देश को कोरोना वायरस जैसे  दानव से आगे लड़ने में संयम प्रदान करेगा और भारत के नागरिक सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर नवदुर्गा की कृपा से कोरोना महामारी को परास्त करेंगे। देश का प्रत्येक नागरिक प्रधानमंत्री जी का हृदय से आभारी है जिन्होंने कोरोना वायरस के खौफ के इस माहौल में भी बिना त्यौहार के, त्योहार जैसी स्थिति पैदा कर लोगों को भयमुक्त बना दिया तथा पूरे देश में एक साथ एक नियत समय पर शंखनाद करवाकर भारतीय संस्कृति सभ्यता को गौरवान्वित कर दिया। अब जनता साहस व विश्वास के साथ इस महामारी का मुकाबला सावधानी व संयम से करने के तैयार हो गयी है।
जय हिंद जय भारत। । 


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Saturday, 21 March 2020

कहीं कोरोना वायरस का कहर मानवता की रक्षा व प्रकृति के संरक्षण का सदेंश तो नहीं

प्रकृति से श्रेष्ठ और बलवान इस ब्रहमांड में कुछ भी नहीं है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कोरोना वायरस का कहर जिसके वजह से आज विश्व के 150 से अधिक देश प्रभावित है।  निस्संदेह यह समस्या मानव जनित है और इसकि भयावहता के माध्यम से प्रकृति ये सदेंश दे रहा है कि मनुष्य जन्म लेकर मानवता के परिचायक बनो ना कि दानवता का। आज हम सबको प्रकृति के इस प्रकोप को भूत, वर्तमान और भविष्य के कसौटी पर रखकर जीवन को समझने का प्रयास करना चाहिए।  सुनामी, भूकंप और कोरोना वायरस जैसी आपदाएं समय-समय पर कुछ सदेंश लेकर आती है मानव समाज को जागृत करने के लिए । यदि हम समझने का प्रयास करे तो देखे कैसे एक वायरस ने बहुत कुछ सिखा दिया हम सबको। जैसेकि आज राष्ट्रों की सीमाएं टूट गईं आतंकी बंदूकें खामोश हैं, अमीर - गरीब का भेद मिट गया। आलिंगन,चुम्बन का स्थान मर्यादित आचरण ने ले लिया। क्लब,स्टेडियम, पब, मॉल, होटल,बाज़ार के ऊपर अस्पताल की महत्ता स्थापित हो गई। अर्थशास्त्र के ऊपर चिकित्साशास्त्र स्थापित हो गया। एक सुई, एक थर्मामीटर, गन,मिसाइल टैंक से अधिक महत्वपूर्ण हो गया।
मंदिर चर्च दरगाह मस्जिद बंद कर दिया गया है सारे आडंबर, दर्शन -प्रदर्शन सब बंद । मांसाहारी भोजन बंद शाकाहारी जीवन शैली को लोग अपनाने को आतुर है। पुरा विश्व आज भारतीय संस्कृति व परंपरा को अपनाने को तैयार हैं।धर्म पर अध्यात्म स्थापित हो गया। भीड़ में खोया आदमी परिवार में लौट आया, पर संपर्क दुःखदायी और निज संपर्क सुखदाई हो गया है। चहुँ ओर केवल कोरोना वायरस से जीवन रक्षा कैसे की जाएँ बस यही चर्चा चल रही है।
कोरोना वायरस का अद्भुत असर जरा देखिये आज एक बार फिर से बुजुर्गों व अनुभवी लोगों की प्रचलित लोकोकति "जो होता है अच्छा होता है" को चरितार्थ कर दिया। कम से कम इसी बहाने ही सही लोग बहुत कुछ समझने सोचने व जीवन शैली में बदलाल लाने का प्रयास तो करेंगे। आज ये वायरस प्रकोप हमे यह समझाने का प्रयास कर रहा है कि मानवता से बड़ा कोई धर्म संप्रदाय या देश नहीं होता।
इस लिए जीवन के प्रति दृढ़संकल्प और संयमित रहते हुए सदैव मानवता व प्रकृति के रक्षा संरक्षण के लिए तत्पर रहे । जीवन में सावधानी और सतर्कता रखें,लपारवाह न बनें। यही कोरोना का संदेश है।

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